Friday, 16 October 2020

ज़िन्दगी_calling

 #ज़िन्दगी_calling


दफ़्तर की मसरूफ़ियत में कभी कभी फ़ुर्सत के कुछ लम्हे मिलते हैं जो अक्सर चाय के साथ फोन पर ही बीतते हैं। दफ़्तर में मैं अक्सर फोन नहीं उठा पाता और अगर कोई जाने पहचाने नम्बर से मिस्ड कॉल हो तो इन्ही लम्हों में कॉलबैक किया करता हूँ।

 ऐसे ही एक ब्रेक में चाय की पियाली के साथ फोन पर मिस्ड कॉल्स देख रहा था कि अचानक फोन बजने लगा। फोन पर मेरा ही नाम मेरे ही नम्बर के साथ उभरने लगा।  ज़ाहिर है कि मैं हैरान था।  फोन उठाया तो मीठी सी आवाज़ में उसने कहा, "हेलो, मैं ज़िन्दगी बोल रही हूँ, क्या मेरी बात नकुल गौतम जी से हो रही है?"


"जी कौन बोल रही हैं", मैंने सुनिश्चित करना चाहा।

"जी मैं ज़िन्दगी बोल रही हूँ ", जवाब और भी मीठी आवाज़ में था।

"जी हाँ, मैं नकुल गैतम ही बोल रहा हूँ"

"नकुल जी, क्यों कि आप लम्बे समय से हमारी सेवाएं ले रहे हैं, सो यह एक फीडबैक कॉल है। आपके पाँच मिनट लेना चाहती हूँ। क्या यह उचित समय रहेगा?"

"जी हाँ, कहिये", मैंने अपनी घड़ी को देखते हुए कहा।


"आपको बता दूँ कि आपकी सभी बातें रिकॉर्ड की जाएंगी। क्या आप इसके लिये अनुमति दे सकते हैं", उसने अनुरोध किया।

"जी बिल्कुल", मैं और भी आश्चर्य चकित हुआ।

 "क्या मैं जान सकती हूँ कि आपको हमारी सेवाएं कैसी लग रही हैं" 

"मैं काफी हद तक संतुष्ट हूँ", असमंजस में पड़ते हुए मैंने कहा।

"एक से पाँच के स्केल पर, जिसमें 'एक' मतलब बिल्कुल संतुष्ट नहीं और 'पाँच' मतलब बिल्कुल संतुष्ट, आप हमें गुणवत्ता में क्या स्थान देंगे"।

"यह तो दुविधा में डाल दिया आपने, आप किसी विशेष सेवा की बात करें। सभी सेवाओं को कैसे एक अंक में तौल सकते हैं", मैं उलझन में था।

"जी आप औसतन अंक दे सकते हैं; खुशी, समृद्धि, व्यवसाय, संतुष्टि, प्रेम, परिवार इत्यादि सभी को ध्यान में रखते हुए।"


"जी मैं बिल्कुल संतुष्ट हूँ, मैं पाँच अंक देना चाहूँगा", मैंने विनम्र होने की कोशिश में कहा।

"जी शुक्रिया। क्या मैं जान सकती हूँ कि आप को हमारी कौन सी सेवा सबसे अच्छी लगी", ज़िन्दगी ने अगला सवाल किया।

"यह तो बहुत कठिन है। सब सुविधाओं में एक को चुनना बहुत कठिन है, मैंने सोचते हुए कहा।

"जी खुशी, प्रेम, क्रोध इत्यादि संवेदनाएं, परिवार, प्रकृति जैसी सुविधाएं, बदलते मौसम, अनेकों रंग, हज़ारों तारे, अगणित स्वाद  इत्यादि बहुत सी चीज़ों में से सबसे उपयोगी आप किसे मानते हैं?"

"प्रेम और परिवार", मैंने गहरी साँस लेकर कहा।

"जी शुक्रिया, आप को हमारी कौन सी सुविधा या किस सेवा से सबसे अधिक शिकायत रही है", अगला प्रश्न और उलझन भरा था।

"जैसे..." मैंने विकल्पों की जिज्ञासा में पूछा।

" जैसे कष्ट, विछोह, परेशानियाँ, अपराध, सामाजिक दबाव, दर्द इत्यादि"

"जी इनमें से ऐसा कुछ नहीं जिससे मुझे शिकायत हो। ये सब तो जीवन को रोमांचक बनाते हैं। अगर मुझे शिकायत है तो सिर्फ इस बात से कि मुझे मेरी मेहनत के अनुसार फल नहीं मिलता", मैंने बहुत सोच विचार के बाद कहा।

"जी शुक्रिया, आपकी मेहनत का फल आपकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।"

"क्या आप अपने प्रियजनों को हमारी सेवाओं का लाभ उठाने की सलाह देंगे", अगला प्रश्न था।

"जी वे सब तो आपकी सेवाएं ले ही रहे हैं। इस प्रश्न का क्या औचित्य है", मैं असमंजस में था।

"जी हमारे कैटालॉग के अनुसार यही अगला प्रश्न है। क्या आप उन्हें फिर से हमारी सेवाओं की सलाह देंगे"।

"जी बिल्कुल। जीवन बहुत खूबसूरत है। अगर यह नहीं होता तो हम इस पर चर्चा ही कैसे करते। जैसा कि किसी विद्वान ने कहा है, ज़िन्दगी में सबसे महत्वपूर्ण ज़िन्दगी ही तो है", मैंने उत्साहित होकर कहा।

"क्या आप कोई प्रश्न करना चाहते हैं", अगला प्रश्न था।

"जी, मैं कौन हूँ, परम सत्य क्या है", मैंने पूछा।

"जी इस प्रश्न का उत्तर देने की हमें अनुमति नहीं। इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना आपका उत्तरदायित्व है", उत्तर मिला।

"तो यह बता दीजिये कि मृत्यु के बाद क्या होता है", मैंने प्रश्न किया।

"जी मृत्यु भी जीवन का ही भाग है", उत्तर मिला।

"मतलब, कृपया विस्तार से बताइये", मैंने फिर प्रश्न किया।

"जी मुझे एक ही प्रश्न का उत्तर देने की अनुमति है। लेकिन क्योंकि आप हमारे लकी कस्टमर हैं, आपको इसका उत्तर मृत्यु के ठीक पहले मिल जाएगा"

"लकी कस्टमर? ऐसा क्यों", मैं ने खुश होकर पूछा।

"जी, हमारे सभी कस्टमर लकी हैं। आपको जीवन मिला यह आपकी खुशनसीब है", बहुत ही मीठी आवाज़ में उत्तर मिला।

"जी शुक्रिया। मैं समझ गया", मैंने संतुष्ट होते हुए कहा।

"जी आपकी इस बातचीत को हमने रिकॉर्ड किया है। यदि आप इस के कुछ अंश अपनी फ़ेसबुक वॉल पर शेयर करेंगे तो हमारी तरफ से आपको कैश बैक दिया जाएगा", आवाज़ और मीठी हो गयी।

"कैश बैक? वह कैसे" मैंने पूछा।

"जी आपके मित्र इसे पढ़ेंगे और इसे लाइक, शेयर करेंगे। आप मुस्कुरायेंगे। मुस्कुराहटें जीवन का सबसे कीमती उपहार हैं। आप मुस्कुराहटें बांटिए आपको भी मिलेंगीं", उत्तर मिला।

"जी बहुत बहुत शुक्रिया, आप से बात करके अच्छा लगा", मैंने हँसते हुए कहा।

"जी हमें भी। अपना कीमती समय देने के लिए शुक्रिया। आपका दिन शुभ हो", कहते हुए फोन कट गया।

मैंने चाय का पियाला रक्खा और टाइप करने बैठ गया।


नकुल गौतम

Tuesday, 1 September 2020

तथास्तु

 

कहते हैं कि ईश्वर केवल तथास्तु कहना जानते हैं। ईश्वर हर पल कहीं न कहीं किसी की बात सुन कर तथास्तु कहते रहते हैं। ऐसे में हर व्यक्ति की बारी कब आ जाये, कहा नहीं जा सकता।


शर्मा जी के जीवन में दो बार ऐसा हुआ और दोनों ही बार वो पछताये।

पहली बार ऐसा तब हुआ जब वे कॉलेज में थे और अपनी रईस प्रेमिका को रिझाने के लिये उन्होंने झूट कह दिया था कि वो किसी रियासत के राजकुमार हैं। जब कॉलेज खत्म होने को था तब वे सच सामने आ जाने के भय से ग्रसित हो गये। घबराहट में एक दिन सोचने लगे कि भांडा फूटने से पहले ही प्रेमिका विवाह के लिए इनकार कर दे तो वे बच जायें। दुर्भाग्यवश इसी दिन ईश्वर के यहाँ उनकी हाजिरी थी। ईश्वर ने तथास्तु कहा और अगले प्रार्थी की ओर मुड़ गये। अगले ही दिन प्रेमिका सॉरी कह निकल गयी। शर्मा जी वास्तव में ऐसा चाहते नहीं थे। वे तो बहुत प्रेम करते थे। बस घबराहट में ऐसा माँग बैठे थे। बहुत पछताये लेकिन अब तो चिड़िया खेत से फ़ुर्र हो चुकी थी। 
कई बरस बाद कल फिर उनकी बात पर ईश्वर ने तथास्तु कहा। सोते समय कॉलेज के दिनों को दिल में टटोलते हुए वे सोच रहे थे कि काश उसकी कोई खबर मिल जाय। ईश्वर ने फिर तथास्तु कहा। अगले दिन नाश्ते के बाद चाय के साथ अखबार पलटते हुए उनकी नज़र उस जानी पहचानी सूरत पर पड़ी। विवरण पढ़ते ही उन्होंने ऊपर सिर उठाया और ईश्वर को कोसने लगे।
अखबार पर तस्वीर के साथ विवरण था, "आप को भारी मन से सूचित किया जाता है कि हमारी माता जी का देहांत हो गया है। शोक सभा कल शाम को गुजराती समाज कल्याण भवन में आयोजित होगी। कृपया फोन न करें।

नकुल


Tuesday, 18 August 2020

खुदकुशी

पहाड़ी इलाकों की खासियत है कि दूर दूर तक साफ देखा जा सकता है। बहुत सी पहाड़ियाँ आसपास हों तो एक पहाड़ी की चोटी से दूसरी पहाड़ी पर आराम से दिखायी देता है। किशोरवस्था में नज़र भी तो कमाल हुआ करती थी।

इस पहाड़ी पर किशोरावस्था में रमेश घंटों इंतजार किया करता था। सामने की पहाड़ी की चोटी पर सपना का घर था जिसे वह घर से निकल कर स्कूल जाते हुए रोज़ देखा करता था। इस पहाड़ी पर रमेश को सपना नहीं देख सकती थी, लेकिन रमेश रोज़ उसे देखता था।

जीवन के इस पड़ाव पर कोई महत्वाकांक्षा, कोई आकर्षण, कोई सम्भावना बाकी नहीं रही थी। सब कुछ तयशुदा सा हो रहा थी। कोई उत्साह, कोई उमंग नहीं थी। पाने की इच्छा भी नहीं रही थी और ना उम्मीद ही थी। यही सोचते हुए रमेश धीरे धीरे पहाड़ी पर चढ़ रहा था। रमेश इसी पहाड़ी से कूद कर जान देने जा रहा था।

पहाड़ी की चोटी पर पहुँच कर उसने एक नज़र सपना के घर की ओर डाली और महसूस किया कि सब कुछ बदल सा गया था। जहाँ सिर्फ एक घर हुआ करता था, वहाँ पूरा मोहल्ला था। नज़र भी अब चुस्त नहीं रही। चाह कर भी वह सपना का घर ठीक से नहीं देख पा रहा था।

पहाड़ी से छलाँग लगाने से पहले उसने इस पहाड़ी को पलट कर देखा। दूर एक कोने में एक लड़का गहरी नीली स्वेटर पहने दिखायी दिया। रमेश दबे पाँव उस ओर गया। उस लड़के का ध्यान रमेश पर ज़रा भी नहीं गया। कितनी बेपरवाह होती है यह उम्र। लड़के से कुछ दूरी पर पहुँच कर उसने महसूस किया कि वह लड़का कितनी ही उम्मीद से सामने की पहाड़ी पर नज़र टिकाये बैठा था। अचानक लड़के के होंठों पर मुस्कान उभर आयी। रमेश ने देखा कि सामने वाली पहाड़ी की चोटी से एक लडक़ी बस्ता उठाये जा रही थी। अचानक रमेश की नज़र एकदम साफ़ हो गयी। उसे अब सपना का घर भी साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था।

उस लड़के की नज़र लड़की के कदमों से कदम मिला रही थी। रमेश पीछे हट गया और पहाड़ी से लौट आया। मेरी नाउम्मीदी को किसी और की संभावनाओं पर अंकुश लगाने का कोई हक़ नहीं।

रमेश अब अक्सर छुप छुप कर इस लड़के को देखने पहाड़ी पर जाता है। वह उस लड़के की संभावनाओं में अपने जीवन को खोजने लगा है।

...
नकुल गौतम

Thursday, 2 July 2020

इमोटिकॉन


उस दिन फेसबुक पर एक नया इमोटिकॉन आया था। यह इमोटिकॉन एक दिल को गले लगाए हुए दर्शाता है। इत्तफाकन रिद्धिमा ने भी नयी तस्वीर फेसबुक पर डाली और रमेश का ध्यान उस इमोटिकॉन पर उस तस्वीर को देखने के बाद ही गया। रमेश ने उस नये इमोटिकॉन का बटन दबाया और उसकी तस्वीर को अंगूठे से ऊपर की ऊपर की ओर धकेलते हुए आगे बढ़ गया।

रिद्धिमा वहीं अटक सी गयी थी। इस इमोटिकॉन का मतलब था कि "मुझे तुम्हारी फिक्र है"। रिद्धिमा शायद बरसों से रमेश से यही तो कहना चाह रही थी। या कि रमेश से यह बात सुनने के लिये तरस रही थी। उसने यह ध्यान ही नहीं दिया कि रमेश इस नये इमोटिकॉन का इस्तेमाल यूँ ही, हर पोस्ट पर किये जा रहा है। रिद्धिमा उस दिन एक दिल के आकार के सॉफ्ट टॉय के साथ घंटों खयालों में रमेश के साथ बतियाती रही। तस्वीर पर हमेशा की तरह आया विनोद का "मिस यू" कॉमेंट आज भी अनुत्तरित ही रहा।

नकुल

Monday, 9 March 2020

महक


"वाह! क्या महक है।"

मिठाइयों की महक आयी तो मिसेज़ शर्मा खिड़की से बाहर झाँकते हुए बोलीं। शर्मा परिवार क्रेसेन्ट अपार्टमेंट की पाँचवीं मंज़िल पर आलीशान फ्लैट में रहता है। सामने एक बस्ती है जहाँ बीस बाइस परिवार रहते हैं। इन घरों के मर्द आस पास की सोसाइटियों में माली या चौकीदार हैं तो महिलाएं घरों में काम कर के अपने परिवार चलाने में योगदान करती हैं।

लो, तुम्हारा वेज शिज़वान मंचूरियन आ गया। डोर बेल सुनते ही शर्मा जी घर के मुख्य द्वार की तरफ बढ़े।

मिसेज़ शर्मा वहीं खिड़की पर अपनी निगाहों से कुछ टटोल रही थीं। शर्मा जी भी उनके साथ आ खड़े हुए।

"त्योहार मनाना तो कोई इन गरीबों से सीखे। नवरात्रि में डांडिया हो, मकर सक्रांति में तिल-गुल या होली-दीवाली, ये लोग सब मिल जुल कर मनाते हैं। धूम धाम से। और एक हम लोग हैं जो इन बड़ी सोसाइटियों में मानो क़ैद हो कर राह गये हैं।" मिसेज़ शर्मा खुशी से बस्ती से उठती महक का मज़ा लेते हुए बोलीं।

"इन सब ढकोसलों के लिए खूब खर्च करते हैं ये लोग मगर कहने को गरीब हैं"। - शर्मा जी मंचूरियन का डिब्बा खोल कर मिसेज़ शर्मा की ओर बढ़ाते हुए बोले।

"त्योहार तो हम गरीबों के लिये होते हैं साहिब"।

पीछे सेंटर टेबल की धूल झाड़ते हुए बाई के हाथ शर्मा जी की यह बात सुन कर ठिठक गये थे।

"अमीर का तो जब दिल किया, पकाया मंगवाया और खा लिया। हम गरीब तो हर त्योहार के बाद अगले त्योहार का इंतज़ार करते हैं कि कुछ अच्छा खाएंगे।

सच कहूँ तो ये नियम या आपकी भाषा में ढकोसले, हम गरीबों के मन बहलाने के लिये ही बनाये गए हैं।"

मिसेज़ शर्मा बाई की संवेदना समझ कर मुस्कुरा रही थीं तो शर्मा जी की निगाहें शर्म से झुक गयी थीं। वेज शिज़वान मंचूरियन उस महक के सामने फीका पड़ गया था।

Friday, 31 January 2020

कच्चा_आम


लोग उसे कच्चा आम कहते थे।

पाँच बरस की उम्र में माता-पिता को खो देने का ग़म वो बर्दाश्त नहीं कर सका और उसका मानसिक विकास वहीं थम गया। हमेशा कच्चा आम चाटते हुए दिखाई देता। जहाँ मन करता पत्थर, कोयले या चॉक से दीवारों पर सुन्दर चित्र बना देता। माता पिता के साथ माता के मंदिर जाता रहा होगा, सो 'जय माता की' उसका तकिया कलाम बन गया था।

मंदिर किसी भी देवता का हो, दरगाह हो कि गुरुद्वारा, वो हर जगह अपने अंदाज़ में 'जय माता की' के नारे लगाता रहता।

तब वो शायद बारह बरस का था । उस दिन बर्फ गिर रही थी और वो हनुमान मंदिर की सीढ़ियों पर माता के जयकारे लगा कर किसी से प्रसाद मिल जाने की उम्मीद में बैठा था। सीढ़ियों पर सामने की पहाड़ी का नज़ारा वो चॉक से उकेर चुका था। तभी वो पहली बार उसे मिली थी और प्रसाद का स्वादिष्ट लड्डू दे गयी। उसने एक पल भी गँवाये बिना भूखे पेट मे लड्डू उतार दिया और "जय माता की" का नारा लगाया। भूख का असर कम हुआ तो उसने देखा, वो बच्ची कहीं नहीं दिख रही थी। "इतनी ठंड में भी स्वेटर नहीं पहनती", वो बड़बड़ाने लगा।

"स्कूल में छुट्टी होगी क्या...
सर्दियों में कच्चे आम क्यों नहीं मिलते...
वो इतनी सुबह घर से क्यों निकली होगी..."
वो अपनी कुटिया तक बड़बड़ाता हुआ गया था।

अब वो सत्तर साल का हो चुका है।

उसकी कुटिया के पास एक भवन में उसकी चित्रकारी की प्रदर्शनी बारह महीने लगी रहती है। जो भी देखने आता है, उसे भोजन, लड्डू, जरूरत के मुताबिक कपड़े या कच्चे आम दे जाता है।

"बाबा! आ जाइये।"
सुबह से जारी बर्फबारी के बीच रोज़ की तरह वो आज भी आयी। वही गोटे वाली चुनरी और लाल कुर्ती पहने और हाथ में प्रसाद लिये।
वो हमेशा की तरह खाने के लिये टूट पड़ा।
जब तक प्रसाद खाया रोज़ की तरह बड़बड़ाता रहा।
"स्वेटर क्यों नहीं पहनती...

स्कूल क्यों नहीं जाती...
रोज़ कहाँ गायब हो जाती है..."

फिर वो चिल्लाया

"सुनो!
कोई नहीं मानता कि यहाँ लोग आकर मुझे खाना देते हैं...
सब इस चित्र भवन को खंडर कहते हैं...
कोई नहीं मानता कि तुम यहाँ आती हो"...

फिर शांत होते ही मुस्कुराया और बड़बड़ाने लगा
"सर्दियों में कच्चे आम कहाँ से ले आती होगी"

वो खंडर के पत्थरों पर लेट गया और आम चाटने लगा। ~नकुल गौतम मौलिक एवं स्वरचित

किशोर दा


राज़ हेयर ड्रेसर की कैंचियाँ संगीत की लय के साथ थिरकती हुईं बहुत शानदार रही थीं। रेडियो पर एक के बाद एक किशोर दा के गीत सुनाये जा रहे थे। जुनैद और दिनेश दोनों एक-एक अन्तरे का आनन्द ले रहे थे।

"फिर क्यों संसार की बातों से,
भीग गये तेरे नैना... कुछ तो लोग कहेंगे।

आहा...

"तेरी नज़र, बन के ज़ुबाँ, लेकिन तेरे पैग़ाम दिए जाये..
ये शाम मस्तानी, मदहोश किये जाय..."

क्या खूब...

इतने में रेडियो पर "आज के मुख्य समाचार" सुनाये जाने लगे। देश में फैल रहे द्वेष को लेकर मंत्री जी की चिंता का बयान सुनते ही जुनैद भड़क उठा। "सब इन्ही का तो किया धरा है", जुनैद बड़बड़ाया।

"सरकार जो कर रही है ठीक कर रही है। सत्तर साल से जो नहीं हुआ और जो सैंतालीस में हो जाना चाहिये था, वो आज हो रहा है", दिनेश बोला।

जुनैद भड़क गया - "तुम्हारी एक नहीं चलेगी। हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं"।

"बिल्कुल हमारे बाप दादाओं का है हिन्दुस्तान। ये हमारी मिट्टी है जिसे हम बर्बाद नहीं होने देंगे", दिनेश लगभग चिल्लाते हुए बोला।

रेडियो एंकर की मधुर आवाज में अगली उद्घोषणा हुई...
"आइये सुनते हैं अगला नगमा, किशोर कुमार की आवाज़ में। गीत लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसे संगीतबद्ध भी किशोर कुमार ने ही किया है। गीत के बोल..."कोई हमदम ना रहा..."

जुनैद और दिनेश फिर से गीतों में खो गये। कैंचियाँ फिर से सुरबद्ध लगने लगीं।

Tuesday, 28 January 2020

आबे रवां - "चौबीस घण्टे रनिंग वाटर" - विभोम स्वर जनवरी 2019


आबे रवां - "चौबीस घण्टे रनिंग वाटर"

आज राजेश का शहर और दफ़्तर दोनों में पहला दिन था। उसने ट्रेन से उतरते ही ब्रोकर को फोन किया और याद दिलाया कि शाम पाँच बजे उसे घर की चाभियाँ मिल जानी चाहियें। स्टेशन से रिक्शा लेकर अपने दफ़्तर के पते पर गया और सुनिश्चित किया कि वह दफ़्तर की इमारत को पहचान ले।

"पहले दिन पर कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए", राजेश ख़ुद को समझा रहा था।

अभी सात ही बजे थे, सो वह नज़दीक ही एक सराय में फ्रेश होने चला गया। इस सराय में लोग सिर्फ नहाने के लिए आते हैं। मुम्बई में ऐसे कईं गेस्ट हाउस हैं जहाँ लोग केवल फ्रेश होने ही आते हैं, और फिर अपने काम पर निकल जाते हैं। राजेश को इस सराय की जानकारी ब्रोकर से ही मिली थी। डोरमेट्री में सामान रखकर नहाने जाते हुए उसे अपने सामान की चिंता हो रही थी, मगर उसके पास कोई चारा नहीं था। बाथरूम में बड़े बड़े अक्षरों में "पानी का सदुपयोग" करने की अपील दर्ज थी लेकिन इस बोर्ड के ठीक नीचे का नल खराब होने की वजह से लगातार टपक रहा था। नहा धोकर निकला तो साढ़े आठ हो गए थे। अपना सामान क्लोक रूम में रखकर वह दफ़्तर पहुँच गया।

ऑफिस के ब्रेकआउट एरिया में पानी का एक डिस्पेंसर लगा हुआ था। राजेश ने देखा कि एक व्यक्ति ने पानी का आधा गिलास पिया और आधा सिंक में उढेल दिया। राजेश को यह बहुत अजीब सा लगा।

"कल हमारी बिल्डिंग में पानी सिर्फ़ आठ घण्टे आया, यू क्नो", रिसेप्शन से गुज़रती हुई एक महिला अपनी सहेली से बतिया रही थी।
"सिर्फ़ आठ घंटे"... राजेश यह सुनकर चौंक सा गया। राजेश के मन में उसकेे बचपन से लेकर जवानी तक का फ़्लैश बैक चलने लगा...

राजेश को यह याद नहीं था कि वह पहली बार पिता जी के साथ पानी भरने कब गया था। होश संभाला तो हाथ में डालडा का डिब्बा लियेे अपने बड़े भाई-बहन के साथ पानी भरने हैण्ड पंप पर खड़ा था। हर रोज़ सुबह जागता तो घर में चले 'पानी भरो आंदोलन' में शामिल हो जाता। माँ रसोई में मोर्चा संभाले खड़ी होती, और पिता जी हैण्ड पम्प पर। तीनों भाई बहन हैण्ड पम्प से घर तक डिब्बों में पानी ढोते। हैण्ड पम्प पर सलीक़े से पूरे मोहल्ले की बाल्टियाँ एक क़तार में लगी होती थीं। जल भरो आंदोलन युद्ध स्तर पर चलता। न जाने कितनी पानीपत की लड़ाइयों का गवाह था यह हैण्ड पम्प। कभी कभी हैंडपम्प भी सूख जाता तो गाँव से बाहर किसी हैंडपम्प की खोज की जाती। स्कूटर पर किसी तरह दोनों बाप बेटे चार डिब्बे पानी भर लाते। घर में म्युन्सिपल्टि का नल था जो केवल तीस मिनट तक अपने गले से आवाज़ें निकालता था। माँ इस नल को निचोड़ कर एक बाल्टी तो भर ही लेती थीं।

कुछ बड़े हुए तो पिता जी ने घर के आँगन में एक टैंक बनवाने की सोची। इसके लिए स्लैब बना ही था कि शहर से चाचा जी का फोन आ गया। बिना उनकी इजाज़त के टैंक बनवाने की योजना पर उन्हें आपत्ती थी। कईं साल स्लैब आँगन में बिना टैंक के खड़ा रहा। हाँ, इस स्लैब पर बड़े होते राजेश और उसके मित्र बहुत खेलते। घर-घर खेलने के लिए एक उपयुक्त स्थान बन गया। जब तक जवानी आई, इस स्लैब पर पिता जी ने अपने खर्च पर दो टैंक रखवा दिए, और इनमे से एक पर चाचा जी के घर का नम्बर लिखवा दिया। अब चाचा जी को कोई आपत्ती नहीं थी क्योंकि बिना जेब ढीली किये एक टैंक मिल गया था।

लेकिन ये टैंक कभी पूरे नहीं भरे। अब सुबह उठते ही राजेश का पहला काम स्लैब पर चढ़ कर टैंक में पानी का स्तर देखने का होता था। बहन की शादी हो चुकी थी और पिता जी में अब उतना ज़ोर नहीं था। दोनों भाइयों पर इन टैंकों में इतना पानी जमा करने का जिम्मा था कि पूरा दिन निकल जाये। कभी किसी रबड़ की नाली में अपने फेफड़ों के ज़ोर से हवा खींचते तो कभी हैण्ड पम्प से भरकर बाल्टियाँ खींचते, मगर ये टैंक कभी पूरे नहीं भरे। पानी का दबाव इतना कम रहता था कि रसोई का नल खुलता तो बाथरूम में पानी बन्द हो जाता। पिता जी दाढ़ी बनाते हुए अक्सर चिल्लाते थे, "अरे कोई रसोई का नल बन्द करो"।

बरसात में एक टिन का ड्रम छत के किनारों से गिरते पानी से भर लिया जाता था। शौचलय में यही पानी इस्तेमाल किया जाता था। फ्लश नामक उपकरण केवल मेहमानों के लिए ही लगवाया गया था। अगर किसी घर के सदस्य ने गलती से फ्लश चला दी तो पिता जी दो घंटे तक प्रवचन देते थे। मेहमानों को भी पिता जी "जल ही जीवन है" पर उपदेश दिया करते थे। बुआ जी एक दो दिन के लिये आतीं तोे कभी नहाती ही नहीं थी। पता नहीं कब क्या उपदेश मिल जाए।

शहर में नौकरी मिलने पर भी राजेश को यही चिंता सता रही थी कि आखिर भाई अकेले पानी कैसे भरेगा। पिता जी भी राजेश के लिये चिंतित थे।

"सुबह उठ कर समय से पानी भर लिया करना। सोये मत रहना", पिता जी का प्यार भी डाँट के रूप में ही बरसता था।

शाम पाँच बजते ही राजेश ने ब्रोकर को फोन किया। ब्रोकर ने उसे इमारत का नाम और दिशा निर्देश फोन पर ही दे दिए। दिए गए पते पर पहुँचा तो चौकीदार ने राजेश को घर की चाभी थमा दी। "घर कईं दिन से बन्द है। नालियों में पानी कईं दिन से रुका होगा, कुछ देर नल खुला छोड़ देना।" चौकीदार ने राजेश को समझाते हुए कहा।
"पानी सुबह कितने बजे आता है?", राजेश ने चौकीदार से पूछा।
"24 घंटे रनिंग वाटर है साहब", चौकीदार ने उत्तर दिया।
घर में सामान रखते ही राजेश ने रसोई और बाथरूम का नल खोल दिया। जैसा की चौकीदार ने कहा था, नल से कुछ बासी पानी बहने लगा। राजेश ने रसोई के स्लैब पर बैठ कर पिता जी को फोन लगाया...

"काम का पहला दिन कैसा रहा बेटा?" पिता जी ने पूछा।
"पापा! यहाँ 24 घंटे नल में पानी आता है।" राजेश ने उत्तर दिया।
"जुग जुग जियो बेटा... खूब तरक़्क़ी करो"। पिता जी का गला भर आया था। राजेश की आँखें भी नम हो गयीं। नल से अब साफ़ पानी बहने लगा था।

नकुल गौतम

अपना_डिब्बा


हाँफते हुए बोगी में चढ़े बुज़ुर्ग के चेहरे के भाव साफ बता रहे थे कि उन्हें अपनी गलती का एहसास भी है और पछतावा भी। लेकिन गाड़ी चल चुकी है तो अब जनरल डिब्बे में जाने के लिये अगले स्टेशन तक यहीं रुकना होगा।

न जाने क्या मजबूरी रही होगी। क्यों देर हुई होगी। बड़ी तेज़ी से भागे होंगे। जैसे ही प्लेटफॉर्म पर पहुँचे होंगे तो गाड़ी छूट रही होगी। तभी तो ए.सी. कोच में चढ़ गये होंगे।

कुछ देर की परेशानी के बाद उन्होंने डिब्बे को ध्यान से देखा। बहुत हैरत से इस कोच में उपलब्ध सुविधाओं का जायज़ा लिया। चारों ओर पसरे सुकून को देखा। कोई जगह खाली नहीं थी लेकिन डिब्बा खाली ही लग रहा था। उन्हें बैठना नहीं था, लेकिन सब कुछ देखने की चाह थी।

टिकट चेकर के आते ही उन्होंने साफ साफ अपना पक्ष रख दिया। अफसर अच्छा था और उसने उन्हें जनरल डिब्बे के पास लगे शटर के पास जाकर खड़े होने की हिदायत दी। जुर्माने का ज़िक्र भी नहीं किया। कोच में किसी ने भी बुज़ुर्ग पर ध्यान तक नहीं दिया। सभी अपने फोनों को अपने अँगूठों, उँगलियों से सहलाते रहे।

कुछ देर में अफसर ने पैंट्री कर्मचारी को हिदायत दी और उसने शटर खोल दिया। जनरल डिब्बा खचाखच भरा हुआ था। बुज़ुर्ग के प्रवेश करते ही "कहाँ जाएंगे चाचा", "कहाँ चढ़ गये थे अंकल", "गिर मत जाना" जैसे वाक्यों से भीड़ ने स्वागत किया। ये सब अनजान आवाज़ें अपनी सी लग रही थीं। एक महिला ने उठते हुए कहाँ, "आओ अंकल, यहाँ बैठ जाओ"। बुज़ुर्ग भी अब असहज नहीं लग रहे थे।

लव_यू_ज़िन्दगी


"अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ
अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूँ"

जगजीत सिंह जी की आवाज़ में ग़ज़ल सुनते हुए शर्मा जी की आँखें नम हो गयी थीं। उन्हें अपने बचपन से लेकर कॉलेज के हॉस्टल तक सब कुछ याद आ रहा था। जब से शहर में एक कमरे का मकान लिया था तब से बैंक की किश्तों के बोझ तले उनकी पूरी पगार दब कर रह गयी थी। मिसेज़ शर्मा भी इस संघर्ष में उनका साथ निभाने के लिये हर मुमकिन प्रयास करती थीं। हर साल मिलने वाला दीवाली बोनस भी बैंक में देकर शर्मा दम्पति जल्द से जल्द लोन चुकाने की कोशिश में थी।

इस बार दीवाली बोनस आते ही शर्मा जी धर्मपत्नी को बिना बताए राजस्थान में छुट्टी बिताने का बंदोबस्त कर आये। शुरू में मिसेज़ शर्मा कुछ नाराज़ हुईं, लेकिन जब शर्मा जी ने यह विश्वास दिलाया कि लोन लगभग चुका दिया गया है, तो बहुत खुश हुईं। पूरे सप्ताह की छुट्टी के दौरान शर्मा जी धर्मपत्नी को खुश देखकर कितने खुश थे। उस दिन जैसलमेर के रेत के टीलों पर बारिश हुई। कितना अद्भुत नज़ारा था। मिसेज़ शर्मा कितनी देर फोन पर बेटी से बातें करती रहीं और रेगिस्तान में हुई बारिश का आंखों देखा विवरण देती रहीं। शर्मा जी को रह रह कर पत्नी से लोन के बारे में कहा झूट याद आता और फिर पत्नी की खुशी देख कर सब भूल जाते। छुट्टी खत्म होने पर वापसी विमान से थी। हवाई जहाज़ में चढ़ते हुए मिसेज़ शर्मा की आंखों में खुशी के आँसू आ गये। "लव यू ज़िन्दगी"... शर्मा जी मन ही मन कह रहे थे।

~नकुल गौतम

ऊँचे नीचे कन्धे


पार्टी शुरुअ होने में अभी कुछ वक्त था। मेहमानों के आने का सिलसिला जारी था।

सरिता की सहेलियाँ घर के ड्राइंग रूम में सजे वॉल हैंगिंग की तारीफ़ें कर रही थीं। एक सहेली ने तारीफ़ करते हुए सरिता से कहा, "बेटियाँ घर मे रौनक बनाये रखती हैं। तुम्हारी बेटी भी सयानी हो गयी है। देखो कितना खूबसूरत वॉल हैंगिंग बनाया है।"

"नहीं नहीं। यह बिटिया ने नहीं, मेरे बड़े बेटे ने बनाया है।" सरिता ने सफ़ाई देते हुए कहा।
"देखो कैसे लड़के को लड़कियों के काम सिखा रही है।" अब सरिता की सहेलियाँ कानाफूसी कर रही थीं।
"जाने कब लड़के लड़कियों का अंतर खत्म होगा। अगर लड़कियों को आगे बढ़ने का हक है तो लड़कों को भी तो ये सब सीखने का हक है"। सरिता ने डाँटने के अंदाज़ में सहेलियों से कहा। किटी पार्टी का रंग आज फ़ीका सा था।

नकुल गौतम

प्रेम की मिसाल


विवाह समारोह के सम्पन्न होने के बाद से ही दूल्हे के पिता, जो शहर के बड़े जाने माने नेता भी हैं, बहुत उत्साहित थे। उन्हें अगले दिन के अखबार की प्रतीक्षा थी। उनके बेटे ने एक पीड़ित दलित महिला से प्रेम विवाह कर के मिसाल जो कायम की थी।

अगले दिन के अखबार युवा नेता के विवाह की खबरों से पटी पड़े थे। सभी अख़बार "युवा नेता ने की दलित से शादी", "नेता जी ने गिराई ऊँच नीच की दीवार" जैसी सुर्खियों से सजे हुए थे। नयी नवेली दुल्हन को उदास देख युवा नेता ने उदासी का सबब पूछा। "क्या खबरों में मेरे दलित होने का ज़िक्र ज़रूरी था। हमारे विवाह से हमारी जातियों का क्या लेना देना। हम कॉलेज से दोस्त हैं और हमने विवाह का निर्णय जाति की वजह से तो नहीं लिया।"

अगर तुम दलित न होती तो इतनी खबरें थोड़े ही छपती। और आने वाले चुनाव में मुझे भी टिकट मिलने वाला है। देखो तुम्हारी जाति के सभी वोट मुझे ही मिलेंगे।

दुल्हन के सवालों पर युवा नेता मुस्कुरा कर बोला।

ऐसे ही पिता जी हमारे विवाह के लिए राज़ी नहीं हुए। और इस समय पर हमारा विवाह भी कोई संयोग नहीं। यह तिथि भी पार्टी के उम्मीदवार घोषित होने से ठीक पहले पूरे सोच विचार के बाद निकलवाई गयी थी।

दुल्हन अपने प्रेम को नेता में बदलते देख हैरान थी।

नकुल गौतम

बासी दीवाली


सुबह सुबह पड़ोस की बस्ती के बच्चे सोसाइटी कंपाउंड में चले आये हैं। सब की नज़र से बच कर किसी के भी उठने से पहले, पटाखों के कचरे में से कुछ बचे हुए पटाखे चुनने।

ये पटाखे उनके लिए सोने के सिक्कों से हैं। अब वो अपनी दीवाली मनाएंगे

~नकुल गौतम

हिल स्टेशन


बर्फ़ से ढके देवदार के पेड़ चांदनी रात में चमक रहे थे। पूरा शहर रात में बत्तियों से जगमगा रहा था।

"मैं एक अरसे से तुम्हारे साथ इस जगह शहर में एक हसीं शाम गुज़ारना चाहता था। पूरी उम्र गुज़र गयी पर कभी जेब ने साथ नहीं दिया। आज की यह शाम मेरे लिए वाक़ई बहुत ख़ास है।" शर्मा जी की आँखें नम होने लगीं। पत्नी भी उनके काँधे पर सिर रख कर उनकी बातें सुन रही थी ।

कितने बरस बीत गए। याद है ब्याह के बाद हम यहाँ घूमने आये थे। होटलों की कीमतें बहुत अधिक थीं, तो शहर से बाहर किसी सराय में रुकना पड़ा था।
हाँ, और आपने गोंद की डिबिया को नारियल तेल की शीशी समझ कर... दोनों ज़ोर से हँस पड़े।

शोर सुनकर नर्स ने दरवाज़ा खोला। "आप लोग सो जाइए। कहीं ब्लड प्रेशर बढ़ गया तो कल सर्जरी नहीं हो पायेगी।" नर्स हिदायत देकर चली गयी।

सब कमरों की बत्तियाँ बन्द हो चुकी हैं। सिर्फ़ शर्मा जी के कमरे की बत्ती जली हुई है। अस्पताल के अँधेरे, सुनसान गलियारे इनकी गुफ्तगू दूर तक सुनाई दे रही है।

" चलो इसी बहाने हमारी ये इच्छा तो पूरी हुई"।

~नकुल गौतम

पापा_की_चिट्ठी


खेल के मैदान के साथ ही मेरी दुकान हुआ करती थी।

उस दिन एक पाँच-छः वर्ष का बच्चा एक पुराना सा अंतर्देशीय पत्र लिये सड़क पर बहुत असमन्जित सा इधर उधर देख रहा था।

"क्या हुआ बेटे" मैंने आवाज़ देकर उस से पूछ ही लिया।
"मुझे अपने पापा को चिट्ठी डालनी है" बच्चे ने थोड़ा घबराते हुए उत्तर दिया।

ध्यान से देखने पर पता चला कि जो अंतर्देशीय पत्र उसके हाथ में है, वह किनारों से काट कर खोला गया है और डाकखाने की मुहर भी लगी हुई है।

"चिट्ठी लिख कर लाये हो", मैंने फिर पूछा।
उसकी आंखें बहुत कुछ कह रही थीं पर मैं सबकुछ समझ नहीं पा रहा था।
"मुझे दिखाओ" मेरे कहते ही बच्चे ने चिट्ठी मेरी ओर बढ़ाई। चिट्ठी पर हमारे ही गाँव का पता दर्ज था। शायद यह चिट्ठी उस बच्चे के घर आई कोई पुरानी चिट्ठी थी जिसे यह उठा लाया था। कहीं कोई ज़रूरी चिट्ठी तो नहीं। बहुत से ख़याल मन मे आये। उलट पलट कर देखा लेकिन किसी और कि चिट्ठी पढ़ तो नहीं सकता था। समझाने की कोशिश व्यर्थ थी क्योंकि बच्चा पापा को चिट्ठी भेजने की ज़िद पर अड़ा था।

बहुत सोच विचार के बाद मैंने अपनी दुकान से एक नया लिफ़ाफ़ा लिया और उस पर वही नाम पता लिख दिया जो उस चिट्ठी पर लिखा था। इस लिफ़ाफ़े में वह पुरानी चिट्ठी और साथ में एक छोटी पर्ची डाल दी जिस पर छपा था, "डिअर सन, विथ लव... पापा"।

यह लिफ़ाफ़ा बच्चे को देकर मैंने उसे डाकखाने का लाल डिब्बा दिखाया। "जाओ, इसे उस डिब्बे में डाल दो... रुको, मैं भी आता हूँ।" और मैंने उसी के हाथ से वह चिट्ठी बक्से में डलवा दी। चिट्ठी डाल कर बच्चा खुशी से उछलता हुआ मैदान में भाग गया।

उम्मीद है कि चिट्ठी जिसकी थी, उसे दोबारा मिल गयी होगी, और बच्चा भी पापा का जवाब देख खुश हुआ होगा। हाँ, क्योंकि टिकट लेने का वक़्त नहीं था, सो चिट्ठी बैरंग मिली होगी। हा हा, लेकिन क्या करता। चलिये सॉरी।

~नकुल गौतम

किश्ती


वो किश्ती सिर्फ सात रुपये की थी।

बचपन में हमारे गाँव में लगने वाले मेले की जब भी याद आती है तो वो सात रुपये की किश्ती जो पानी के टब में गोल चक्कर लगाती थी, मेरे मस्तिष्क में घूमने लगती है। पिता जी ने उसकी कीमत पूछी और मुझ से कहा कि यह तो एक दो दिन में खराब हो जायेगी। उस पर डालडा या मोमबत्ती जलाते हुए हाथ भी जल सकता है। यह किश्ती एक चम्मच में छोटी मोमबत्ती या डालडा जला कर ही काम करती थी।

मुझे समझा कर सांत्वना में एक गुब्बारा दिलवा दिया गया था। लेकिन वो पल बालमन में हमेशा के लिये फ्रेम हो गया। आज मैं अच्छा खासा कमा लेता हूँ, लेकिन वो किश्ती मेले में नहीं मिलती। ऑनलाइन मिल भी जाती है लेकिन मुझे मेले से ही लेनी थी। आज जब एक बच्चे के अंतरिक्ष ज्ञान की खबरें पढ़ता या सुनता हूँ तो लगता है कि उस बच्चे ने मेले से दूरबीन खरीदी होगी। उसके पिता खरीद पाये होंगे।

नकुल गौतम

मैं वापिस आऊंगी

 मेरा नाम इतना भी कॉमन नहीं है कि किसी और की जगह मुझे ईमेल आ जाए। फिर दफ्तर में हमारा इंटरेक्शन भी अब उतना नहीं था। उस दिन अचानक जब उसका ईमे...