Tuesday, 28 January 2020

पापा_की_चिट्ठी


खेल के मैदान के साथ ही मेरी दुकान हुआ करती थी।

उस दिन एक पाँच-छः वर्ष का बच्चा एक पुराना सा अंतर्देशीय पत्र लिये सड़क पर बहुत असमन्जित सा इधर उधर देख रहा था।

"क्या हुआ बेटे" मैंने आवाज़ देकर उस से पूछ ही लिया।
"मुझे अपने पापा को चिट्ठी डालनी है" बच्चे ने थोड़ा घबराते हुए उत्तर दिया।

ध्यान से देखने पर पता चला कि जो अंतर्देशीय पत्र उसके हाथ में है, वह किनारों से काट कर खोला गया है और डाकखाने की मुहर भी लगी हुई है।

"चिट्ठी लिख कर लाये हो", मैंने फिर पूछा।
उसकी आंखें बहुत कुछ कह रही थीं पर मैं सबकुछ समझ नहीं पा रहा था।
"मुझे दिखाओ" मेरे कहते ही बच्चे ने चिट्ठी मेरी ओर बढ़ाई। चिट्ठी पर हमारे ही गाँव का पता दर्ज था। शायद यह चिट्ठी उस बच्चे के घर आई कोई पुरानी चिट्ठी थी जिसे यह उठा लाया था। कहीं कोई ज़रूरी चिट्ठी तो नहीं। बहुत से ख़याल मन मे आये। उलट पलट कर देखा लेकिन किसी और कि चिट्ठी पढ़ तो नहीं सकता था। समझाने की कोशिश व्यर्थ थी क्योंकि बच्चा पापा को चिट्ठी भेजने की ज़िद पर अड़ा था।

बहुत सोच विचार के बाद मैंने अपनी दुकान से एक नया लिफ़ाफ़ा लिया और उस पर वही नाम पता लिख दिया जो उस चिट्ठी पर लिखा था। इस लिफ़ाफ़े में वह पुरानी चिट्ठी और साथ में एक छोटी पर्ची डाल दी जिस पर छपा था, "डिअर सन, विथ लव... पापा"।

यह लिफ़ाफ़ा बच्चे को देकर मैंने उसे डाकखाने का लाल डिब्बा दिखाया। "जाओ, इसे उस डिब्बे में डाल दो... रुको, मैं भी आता हूँ।" और मैंने उसी के हाथ से वह चिट्ठी बक्से में डलवा दी। चिट्ठी डाल कर बच्चा खुशी से उछलता हुआ मैदान में भाग गया।

उम्मीद है कि चिट्ठी जिसकी थी, उसे दोबारा मिल गयी होगी, और बच्चा भी पापा का जवाब देख खुश हुआ होगा। हाँ, क्योंकि टिकट लेने का वक़्त नहीं था, सो चिट्ठी बैरंग मिली होगी। हा हा, लेकिन क्या करता। चलिये सॉरी।

~नकुल गौतम

No comments:

Post a Comment

मैं वापिस आऊंगी

 मेरा नाम इतना भी कॉमन नहीं है कि किसी और की जगह मुझे ईमेल आ जाए। फिर दफ्तर में हमारा इंटरेक्शन भी अब उतना नहीं था। उस दिन अचानक जब उसका ईमे...