हाँफते हुए बोगी में चढ़े बुज़ुर्ग के चेहरे के भाव साफ बता रहे थे कि उन्हें अपनी गलती का एहसास भी है और पछतावा भी। लेकिन गाड़ी चल चुकी है तो अब जनरल डिब्बे में जाने के लिये अगले स्टेशन तक यहीं रुकना होगा।
न जाने क्या मजबूरी रही होगी। क्यों देर हुई होगी। बड़ी तेज़ी से भागे होंगे। जैसे ही प्लेटफॉर्म पर पहुँचे होंगे तो गाड़ी छूट रही होगी। तभी तो ए.सी. कोच में चढ़ गये होंगे।
कुछ देर की परेशानी के बाद उन्होंने डिब्बे को ध्यान से देखा। बहुत हैरत से इस कोच में उपलब्ध सुविधाओं का जायज़ा लिया। चारों ओर पसरे सुकून को देखा। कोई जगह खाली नहीं थी लेकिन डिब्बा खाली ही लग रहा था। उन्हें बैठना नहीं था, लेकिन सब कुछ देखने की चाह थी।
टिकट चेकर के आते ही उन्होंने साफ साफ अपना पक्ष रख दिया। अफसर अच्छा था और उसने उन्हें जनरल डिब्बे के पास लगे शटर के पास जाकर खड़े होने की हिदायत दी। जुर्माने का ज़िक्र भी नहीं किया। कोच में किसी ने भी बुज़ुर्ग पर ध्यान तक नहीं दिया। सभी अपने फोनों को अपने अँगूठों, उँगलियों से सहलाते रहे।
कुछ देर में अफसर ने पैंट्री कर्मचारी को हिदायत दी और उसने शटर खोल दिया। जनरल डिब्बा खचाखच भरा हुआ था। बुज़ुर्ग के प्रवेश करते ही "कहाँ जाएंगे चाचा", "कहाँ चढ़ गये थे अंकल", "गिर मत जाना" जैसे वाक्यों से भीड़ ने स्वागत किया। ये सब अनजान आवाज़ें अपनी सी लग रही थीं। एक महिला ने उठते हुए कहाँ, "आओ अंकल, यहाँ बैठ जाओ"। बुज़ुर्ग भी अब असहज नहीं लग रहे थे।
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