विवाह समारोह के सम्पन्न होने के बाद से ही दूल्हे के पिता, जो शहर के बड़े जाने माने नेता भी हैं, बहुत उत्साहित थे। उन्हें अगले दिन के अखबार की प्रतीक्षा थी। उनके बेटे ने एक पीड़ित दलित महिला से प्रेम विवाह कर के मिसाल जो कायम की थी।
अगले दिन के अखबार युवा नेता के विवाह की खबरों से पटी पड़े थे। सभी अख़बार "युवा नेता ने की दलित से शादी", "नेता जी ने गिराई ऊँच नीच की दीवार" जैसी सुर्खियों से सजे हुए थे। नयी नवेली दुल्हन को उदास देख युवा नेता ने उदासी का सबब पूछा। "क्या खबरों में मेरे दलित होने का ज़िक्र ज़रूरी था। हमारे विवाह से हमारी जातियों का क्या लेना देना। हम कॉलेज से दोस्त हैं और हमने विवाह का निर्णय जाति की वजह से तो नहीं लिया।"
अगर तुम दलित न होती तो इतनी खबरें थोड़े ही छपती। और आने वाले चुनाव में मुझे भी टिकट मिलने वाला है। देखो तुम्हारी जाति के सभी वोट मुझे ही मिलेंगे।
दुल्हन के सवालों पर युवा नेता मुस्कुरा कर बोला।
ऐसे ही पिता जी हमारे विवाह के लिए राज़ी नहीं हुए। और इस समय पर हमारा विवाह भी कोई संयोग नहीं। यह तिथि भी पार्टी के उम्मीदवार घोषित होने से ठीक पहले पूरे सोच विचार के बाद निकलवाई गयी थी।
दुल्हन अपने प्रेम को नेता में बदलते देख हैरान थी।
नकुल गौतम
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