Tuesday, 28 January 2020

किश्ती


वो किश्ती सिर्फ सात रुपये की थी।

बचपन में हमारे गाँव में लगने वाले मेले की जब भी याद आती है तो वो सात रुपये की किश्ती जो पानी के टब में गोल चक्कर लगाती थी, मेरे मस्तिष्क में घूमने लगती है। पिता जी ने उसकी कीमत पूछी और मुझ से कहा कि यह तो एक दो दिन में खराब हो जायेगी। उस पर डालडा या मोमबत्ती जलाते हुए हाथ भी जल सकता है। यह किश्ती एक चम्मच में छोटी मोमबत्ती या डालडा जला कर ही काम करती थी।

मुझे समझा कर सांत्वना में एक गुब्बारा दिलवा दिया गया था। लेकिन वो पल बालमन में हमेशा के लिये फ्रेम हो गया। आज मैं अच्छा खासा कमा लेता हूँ, लेकिन वो किश्ती मेले में नहीं मिलती। ऑनलाइन मिल भी जाती है लेकिन मुझे मेले से ही लेनी थी। आज जब एक बच्चे के अंतरिक्ष ज्ञान की खबरें पढ़ता या सुनता हूँ तो लगता है कि उस बच्चे ने मेले से दूरबीन खरीदी होगी। उसके पिता खरीद पाये होंगे।

नकुल गौतम

No comments:

Post a Comment

मैं वापिस आऊंगी

 मेरा नाम इतना भी कॉमन नहीं है कि किसी और की जगह मुझे ईमेल आ जाए। फिर दफ्तर में हमारा इंटरेक्शन भी अब उतना नहीं था। उस दिन अचानक जब उसका ईमे...