Wednesday, 18 April 2018

ब्लैक एन्ड व्हाइट - अप्रैल 2018 विभोम स्वर


बहुत दिनों के बाद अजय स्टोर रूम में गया। दरवाज़ा खुलते ही सीलन की गंध ने नाक पर हमला किया। दीपावली की सफाई की शुरुआत यहीं से होती है। दशहरे के दिन स्टोर रूम में भरे गत्ते के डिब्बे, ख़ाली बोतलें और अन्य धातु के सामान निकाल कर अजय रद्दी वाले को देता है। इसके साथ ही वार्षिक सफाई अभियान के लिये उपयोग में आने का सामान जैसे पुताई के लिए खाली ड्रम, ब्रश, लम्बे बांस के डंडे, लोहे के ब्रश वगैरह भी तो स्टोर में ही रहते हैं। स्टोर के पिछली तरफ बहती नाली की वजह से यहाँ काफी सीलन रहती है। एक मात्र रौशनदान के सामने भी एक पुरानी अलमारी रखी हुई है जिसमे कुछ ग़ैर ज़रूरी सामन भरा हुआ है। इस रौशन दान से हल्की रौशनी के साथ नाली की नम हवा स्टोर में आती रहती है। अजय ने बत्ती जलाई और रद्दी अखबार और डिब्बे बटोरने लगा। तभी एक बूढी सी कराह ने अजय को आकर्षित किया। उसे लगा जैसे किसी ने उसका नाम बुदबुदाया हो। क.. क... कौन है, कौन है यहाँ? अरे अजय! तुम मुझे सुन पाये। म म.. मैं हूँ... ठीक तुम्हारे सामने। अजय को महसूस हुआ कि अलमारी के दरवाज़े की झिर्री से एक मन्द सी आवाज़ आ रही है। अजय ने घबराते हुए अलमारी का दरवाज़ा खोला। क कौन है। अजय ने फिर कहा। अरे मैं हूँ भाई। एक सफ़ेद कपड़े पर एक बिल्ली का चित्र ज़रा सा फड़फड़ाया। यह चित्र इस कपड़े पर अजय ने ही बचपन में बनाया था। माँ ने इसे टीवी पर डाल कर टीवी का कवर बना दिया था। क कौन? तुम... तुम टीवी बोल रहे हो क्या? पर तुम तो कब से खराब.. ? हाँ। मैं ही हूँ। मेरी स्क्रीन में कुछ खराबी थी, कम वोल्टेज में मेरे परदे पर फ़िल्में कभी कभी ऊपर नीचे हुआ करती थीं। लेकिन मेरे स्पीकर तो ठीक ही थे। कहो क्या कहना चाहते हो। अजय, मैं यहाँ पड़ा पड़ा उकता गया हूँ। मुझे यहाँ से बाहर निकलना है। इस बार मुझे भी कबाड़ी को बेच दो। अरे! मैं तुम्हे कैसे बेच सकता हूँ। तुम्हारे साथ कितनी यादें जुड़ी हैं हमारी। यादें... यादें ही तो हैं। क्या फर्क पड़ता है। मुझे अब यहाँ नहीं रहना। क्यों फर्क नहीं पड़ता। तुम तो एक मशीन हो, तुम्हे जज़्बातों की कीमत नहीं मालूम, इसी लिए ऐसा कह रहे हो। जज़्बात? तुम्हे मेरे जज़्बातों की परख कहाँ है अजय। मैं तुम्हारी आहट से तुम्हे पहचान लेता हूँ। तुम चलना भी नहीं जानते थे जब तुम्हारे पिता मुझे खरीद लाये थे। सन तिरासी का जून महीना था। भारत वर्ड कप के सेमी फाइनल में जीत चुका था। सब लोग रेडियो पर ही कॉमेंट्री सुना करते थे। तुम्हारे पिता जी फाइनल देखने के लिए मुझे खरीद लाये थे। मगर... मगर क्या? वही हुआ जो तब अक्सर हुआ करता था। दूरदर्शन का संपर्क लंदन से टूट गया। मुझे बहुत दुःख हुआ था कि मैं पूरा मैच नहीं दिखा सका। तुम्हारे पिता जी भी गुस्से से लाल हो गए। खैर रेडियो सुनते हुए पता चला कि भारत जीत गया है। तुम्हारे पिता जी ने यह खबर सुनकर मुझे और दूरदर्शन को क्षमा कर दिया था। अरे वाह। यह किस्सा तो मैंने कभी सुना ही नहीं। तुम्हें कैसे पता होगा। तुम बहुत छोटे थे तब। और कुछ सुनाओ ना। उसके बाद शाम की ख़बरें, शुक्रवार की फ़िल्में, रविवार का चित्रहार और वो काली सफ़ेद पट्टियाँ तुम्हारे परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बने और धीरे धीरे मैं तुम्हारे परिवार में शामिल हो गया। काली- सफ़ेद पट्टियाँ? हाँ, ये पट्टियाँ टीवी पर तब दिखती थीं जब कुछ प्रसारित नहीं हो रहा होता था। इसके अलावा किसी फ़िल्म के बीच में "रुकावट के लिए खेद है " का सन्देश एक लोकोक्ति की तरह हमारे परिवार में प्रयोग होने लगा। और क्या याद है तुम्हे? बहुत सी यादें हैं, जैसे रामायण का प्रसारण। तुम लोग मुझे घर के आँगन में लगा देते थे और पूरा मोहल्ला रामायण देखता था, और मैं पूरे मोहल्ले को निहारता था। एक दिन बिजली नहीं थी जब पड़ोस का विक्की कहीं से कार की बैटरी लाया था, और पूरे मोहल्ले ने बैटरी से मुझे कनेक्ट कर के रामायण देखी थी। सचिन का पहला मैच भी मेरी यादों में एक अहम जगह रखता है, जिसमें हल्की हल्की मूछों वाला वो छोटा सा लड़का उन पाकिस्तान के ऊँचे कद के खिलाड़ियों के सामने एक शेर की तरह खड़ा हुआ था। तुम तो ऐसे खुश होते थे जैसे तुम ही सचिन तेंदुलकर हो। हा हा। हाँ वो भी कमाल के दिन थे... मेरे बचपन के दिन। बचपन नहीं, लड़कपन। एंटीना ठीक करने के बहाने तुम पड़ोस की छत पर धूप सेंकती लड़कियों को निहारते थे। "क़यामत से क़यामत तक" देखने के लिए तुम वी सी आर किराये पर लाये थे। जब नया नया केबल टीवी शुरुअ हुआ था, तब तुम छत से जाने वाली केबल को मेरे एंटीना की तार से जोड़ कर फ़िल्में देखते थे। "हम आपके हैं कौन", याद है तुम्हें? हाँ हाँ, सब याद है। कितनी फ़िल्में, कितने मैच इसी तरह देखे थे। एक दिन मैंने और पिता जी ने मिलकर एक ही दिन में तीन फ़िल्में निपटाई थीं। हा हा। हाँ... महाभारत, सुरभी, मालगुड़ी डेज़, अलिफ़ लैला, जंगल बुक, चन्द्रकांता, शक्तिमान, सिगमा, अंताक्षरी और सारेगामा। कितने मज़े से तुम सब मिलकर देखते थे। फिर क़स्बे में बिजली की कमी होने लगी। तुम लोग मेरे लिए स्टेब्लाइज़र नहीं लाये और मेरी स्क्रीन ख़राब होने लगी। तुम्हारे परिवार की लापरवाही की सज़ा मुझे ही मिलने लगी। जब भी फ़िल्म क्लाइमेक्स की तरफ़ बढ़ती तो मेरी स्क्रीन के चित्र टेढ़े होने लगते, और तुम मेरे सिर पर ज़ोर से हाथ मारते। दरअस्ल उस समय वोल्टेज कम होती थी, और तुम सब मुझे ही दोष देते थे। अरे हाँ। मुझे तब तक वोल्टेज की कमी के बारे में कुछ नहीं मालूम था। जब इन्जीनीरिंग की पढ़ाई की तब समझ।में आया। फिर सत्तानवे का क्रिकेट वर्ल्डकप आ गया और तुम अपने पिता जी के साथ जा कर नया टीवी ले आये। मैं बहुत दुखी हुआ था। सुना है उस वर्ल्डकप में भारत का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं रहा था। हाँ। बहुत बुरा हुआ। तुमने नहीं देखा था क्या? मैं कैसे देखता भला। बीस साल से यहीं स्टोर में पड़ा हूँ। बस इतना पता है कि वह टीवी भी तुमने दो हज़ार ग्यारह में बदल लिया है। वह भी चौदह साल तुम्हारे ड्राइंग रूम में था और मैं भी। फ़र्क़ बस इतना है कि उसे तुमने एक्सचेंज में आज़ादी दी, और मैं पिछले बीस साल से यहाँ स्टोर में पड़ा हूँ। अरे भाई ऐसा नहीं है। उस टीवी से हमारी उतनी यादें नहीं जुड़ी थीं जितनी तुमसे। और आजकल नए दौर के टीवी हैं। हलके भी हैं और पतले भी। एक दीवार पर तस्वीरों की तरह लटका सकते हैं। तुम्हे पता है.. हमारे घर के हर कमरे में अब एक टीवी है। हाँ! मुझे सब पता है। अब न वो महफ़िलें हैं और न परिवार के साथ देखने लायक कार्यक्रम। समाचार भी व्यावसायिक होते जा रहे हैं। थोड़ा रुक कर टीवी ने फिर से अपनी बात दोहराई: सब नए टीविओं के डिब्बे यहीं स्टोर में तो रक्खे थे। पिछले दशहरे पर तुमने सब निकाल कर कबाड़ी को दे दिए। इस बरस मुझे भी दे दो। कब तक यहाँ पड़ा रहूँगा। लेकिन तुम्हे तो अब कबाड़ी भी नहीं लेगा। तुम्हारे समय की टेक्नोलॉजी अब पुरानी हो गयी है। तुम्हारे पुर्ज़े भी किसी काम के नहीं और तुम्हारी ब्लैक एन्ड व्हाइट स्क्रीन भी अब बस काँच का एक टुकड़ा भर है। अरे कितना वक़्त लगाओगे अजय। जल्दी कबाड़ बाहर निकालो। पिता जी की आवाज़ ने अजय का ध्यान खींचा। टीवी को उदास देखकर अजय ने टीवी को उठाया और बाहर आ गया। अरे, इसे क्यों उठा लाये। कबाड़ी ने कहा। इसका तो मैं एक रुपया भी नहीं दूंगा। अजय ने अपनी जेब से पचास रूपये निकाल कर कबाड़ी को दिए और कहा, "इसे ज़रा प्यार से ले जाना"। कुछ ही देर में कबाड़ी की साइकिल के पीछे बंधा टीवी आज़ादी की साँसे लेता हुआ अपने अंतिम सफ़र पर निकल गया। जाते हुए वह उस घर और आँगन को अपनी ब्लैक एन्ड व्हाइट स्क्रीन पर लगे नीले चश्मे में से निहारता रहा जिसमे उसने अपना स्वर्ण काल बिताया था। नकुल

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