कुल दस सीढ़ियाँ चढ़ने में उस बुज़ुर्ग महिला को लगभग बीस मिनट लग चुके थे। उसका पति ऊपर पहुंच कर उसका इंतज़ार कर रहा था। मुस्कुराते हुए पति ने महिला से कहा, "तुम बूढ़ी हो गयी हो, कितना रुक रुक कर चलती हो"।
"तो ढूंढ लो शहर में कोई जवान लड़की। मेरे सिवा कोई आपके नखरे नहीं उठाएगी।" महिला ने भी अपनी लाठी संभालते हुए कहा।
घण्टी बजाने पर बहू ने दरवाज़ा खोला। चरण स्पर्श की व्यवहारिकता निभा कर बहू रसोई में चली गयी। बेटा कुछ देर में कमरे से बाहर निकला।
"एक सत्संग के लिए इतना लम्बा सफर करके शहर आने की क्या ज़रूरत थी? क्यों इतना कष्ट उठाया" बेटे ने पूछा।
"अब इस उम्र में भजन कीर्तन करके ही समय व्यतीत होता है बेटा"। महिला ने मुस्कुराते हुए कहा।
कुछ देर सुस्ताने के लिए कमरे में गए तो खिड़की से गली की आवाज़ें सुन रही थीं।
"चला जाता नहीं और ट्रेन में बैठ गए। अब दो दिन इन्हीं की आव भगत में निकलेंगे। हड्डियों में जान नहीं है और पैरों को चैन नहीं"। बहू किसी सहेली से शिकायत कर रही थी। दोनों बुज़ुर्ग लेटे हुए सब सुनते रहे।
अगले दिन सत्संग में गये तो दोनों प्रवचन सुनने से अधिक बहू के तानों और बेटे की बेरुखी के बारे में सोच रहे थे। एक दूसरे से आँख चुरा कर थोड़ा रो कर अपना मन भी हल्का कर लिया। बीच में उठ कर ही घर लौट आये।
"बेटा आठ बजे दिल्ली की गाड़ी में बिठा देना। कल वहां सत्संग है"। बुज़ुर्ग ने बेटे से कहा।
"अब दिल्ली जाकर बाबा कुछ नया कहेंगे क्या? एक ही बात दोहराते हैं ये लोग। भैया को भी परेशानी होगी।" बेटे ने चिढ़ते हुए कहा।
"तुम नहीं समझोगे बेटा, जब बूढ़े हो जाओगे, तब शायद समझ पाओ"। पिता ने समझाते हुए कहा।
पत्नी की आँखों में देखते हुए बुज़ुर्ग सोचने लगा "अब यह कहाँ समझ पायेगा कि हम सत्संग के बहाने दोनों बेटों से मिलने की तम्मन्ना पूरी कर रहे हैं"।
नकुल गौतम
संपर्क सूत्र: बी विंग, 202, सरयू, शुचिधाम
मलाड पूर्व, मुम्बई 97
ईमेल: nakulgautam1@gmail.com
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