#त्योहार
"बड़े तेज़ कदमों से बाज़ार की तरफ जा रहे हो? सब ठीक?" इकबाल ने फ़िरोज़ को टोका।
ठिठकते हुए फ़िरोज़ ने इकबाल को देखा और बोला, "मिठाई लेनी है और घर में कुछ मरम्मत के काम के लिये प्लम्बर को भी बोलना है। थोड़ा जल्दी में हूँ। दीवाली के बाद मिलते हैं।"
"एक फुलझड़ी का डिब्बा और आधा किलो काजू बर्फी मेरे लिये भी ले आना। मैं किसी के हाथ रुपये भिजवा कर तुम्हारे घर से मँगवा लूँगा", इकबाल बोला।
ठीक है, बोलकर फ़िरोज़ ने अपने कदम फिर से तेज़ किये।
रमेश ने शर्मा जी से पूछा, "पिता जी! ये चचा तो मुसलमान हैं, फिर दीवाली की तैयारी में क्यों लगे हैं"?
शर्मा जी बेटे के प्रश्न पर मुस्कुराए। "बेटा दीवाली पर शहर के स्कूलों में छुट्टियाँ होती हैं। जब पोते पोतियाँ घर आएं तभी त्योहार मनता है। पोतों के आने पर ईद या दीवाली में कोई फर्क नहीं रहता।"
स्वरचित एवं मौलिक
~नकुल गौतम
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