Tuesday, 28 January 2020

आबे रवां - "चौबीस घण्टे रनिंग वाटर" - विभोम स्वर जनवरी 2019


आबे रवां - "चौबीस घण्टे रनिंग वाटर"

आज राजेश का शहर और दफ़्तर दोनों में पहला दिन था। उसने ट्रेन से उतरते ही ब्रोकर को फोन किया और याद दिलाया कि शाम पाँच बजे उसे घर की चाभियाँ मिल जानी चाहियें। स्टेशन से रिक्शा लेकर अपने दफ़्तर के पते पर गया और सुनिश्चित किया कि वह दफ़्तर की इमारत को पहचान ले।

"पहले दिन पर कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए", राजेश ख़ुद को समझा रहा था।

अभी सात ही बजे थे, सो वह नज़दीक ही एक सराय में फ्रेश होने चला गया। इस सराय में लोग सिर्फ नहाने के लिए आते हैं। मुम्बई में ऐसे कईं गेस्ट हाउस हैं जहाँ लोग केवल फ्रेश होने ही आते हैं, और फिर अपने काम पर निकल जाते हैं। राजेश को इस सराय की जानकारी ब्रोकर से ही मिली थी। डोरमेट्री में सामान रखकर नहाने जाते हुए उसे अपने सामान की चिंता हो रही थी, मगर उसके पास कोई चारा नहीं था। बाथरूम में बड़े बड़े अक्षरों में "पानी का सदुपयोग" करने की अपील दर्ज थी लेकिन इस बोर्ड के ठीक नीचे का नल खराब होने की वजह से लगातार टपक रहा था। नहा धोकर निकला तो साढ़े आठ हो गए थे। अपना सामान क्लोक रूम में रखकर वह दफ़्तर पहुँच गया।

ऑफिस के ब्रेकआउट एरिया में पानी का एक डिस्पेंसर लगा हुआ था। राजेश ने देखा कि एक व्यक्ति ने पानी का आधा गिलास पिया और आधा सिंक में उढेल दिया। राजेश को यह बहुत अजीब सा लगा।

"कल हमारी बिल्डिंग में पानी सिर्फ़ आठ घण्टे आया, यू क्नो", रिसेप्शन से गुज़रती हुई एक महिला अपनी सहेली से बतिया रही थी।
"सिर्फ़ आठ घंटे"... राजेश यह सुनकर चौंक सा गया। राजेश के मन में उसकेे बचपन से लेकर जवानी तक का फ़्लैश बैक चलने लगा...

राजेश को यह याद नहीं था कि वह पहली बार पिता जी के साथ पानी भरने कब गया था। होश संभाला तो हाथ में डालडा का डिब्बा लियेे अपने बड़े भाई-बहन के साथ पानी भरने हैण्ड पंप पर खड़ा था। हर रोज़ सुबह जागता तो घर में चले 'पानी भरो आंदोलन' में शामिल हो जाता। माँ रसोई में मोर्चा संभाले खड़ी होती, और पिता जी हैण्ड पम्प पर। तीनों भाई बहन हैण्ड पम्प से घर तक डिब्बों में पानी ढोते। हैण्ड पम्प पर सलीक़े से पूरे मोहल्ले की बाल्टियाँ एक क़तार में लगी होती थीं। जल भरो आंदोलन युद्ध स्तर पर चलता। न जाने कितनी पानीपत की लड़ाइयों का गवाह था यह हैण्ड पम्प। कभी कभी हैंडपम्प भी सूख जाता तो गाँव से बाहर किसी हैंडपम्प की खोज की जाती। स्कूटर पर किसी तरह दोनों बाप बेटे चार डिब्बे पानी भर लाते। घर में म्युन्सिपल्टि का नल था जो केवल तीस मिनट तक अपने गले से आवाज़ें निकालता था। माँ इस नल को निचोड़ कर एक बाल्टी तो भर ही लेती थीं।

कुछ बड़े हुए तो पिता जी ने घर के आँगन में एक टैंक बनवाने की सोची। इसके लिए स्लैब बना ही था कि शहर से चाचा जी का फोन आ गया। बिना उनकी इजाज़त के टैंक बनवाने की योजना पर उन्हें आपत्ती थी। कईं साल स्लैब आँगन में बिना टैंक के खड़ा रहा। हाँ, इस स्लैब पर बड़े होते राजेश और उसके मित्र बहुत खेलते। घर-घर खेलने के लिए एक उपयुक्त स्थान बन गया। जब तक जवानी आई, इस स्लैब पर पिता जी ने अपने खर्च पर दो टैंक रखवा दिए, और इनमे से एक पर चाचा जी के घर का नम्बर लिखवा दिया। अब चाचा जी को कोई आपत्ती नहीं थी क्योंकि बिना जेब ढीली किये एक टैंक मिल गया था।

लेकिन ये टैंक कभी पूरे नहीं भरे। अब सुबह उठते ही राजेश का पहला काम स्लैब पर चढ़ कर टैंक में पानी का स्तर देखने का होता था। बहन की शादी हो चुकी थी और पिता जी में अब उतना ज़ोर नहीं था। दोनों भाइयों पर इन टैंकों में इतना पानी जमा करने का जिम्मा था कि पूरा दिन निकल जाये। कभी किसी रबड़ की नाली में अपने फेफड़ों के ज़ोर से हवा खींचते तो कभी हैण्ड पम्प से भरकर बाल्टियाँ खींचते, मगर ये टैंक कभी पूरे नहीं भरे। पानी का दबाव इतना कम रहता था कि रसोई का नल खुलता तो बाथरूम में पानी बन्द हो जाता। पिता जी दाढ़ी बनाते हुए अक्सर चिल्लाते थे, "अरे कोई रसोई का नल बन्द करो"।

बरसात में एक टिन का ड्रम छत के किनारों से गिरते पानी से भर लिया जाता था। शौचलय में यही पानी इस्तेमाल किया जाता था। फ्लश नामक उपकरण केवल मेहमानों के लिए ही लगवाया गया था। अगर किसी घर के सदस्य ने गलती से फ्लश चला दी तो पिता जी दो घंटे तक प्रवचन देते थे। मेहमानों को भी पिता जी "जल ही जीवन है" पर उपदेश दिया करते थे। बुआ जी एक दो दिन के लिये आतीं तोे कभी नहाती ही नहीं थी। पता नहीं कब क्या उपदेश मिल जाए।

शहर में नौकरी मिलने पर भी राजेश को यही चिंता सता रही थी कि आखिर भाई अकेले पानी कैसे भरेगा। पिता जी भी राजेश के लिये चिंतित थे।

"सुबह उठ कर समय से पानी भर लिया करना। सोये मत रहना", पिता जी का प्यार भी डाँट के रूप में ही बरसता था।

शाम पाँच बजते ही राजेश ने ब्रोकर को फोन किया। ब्रोकर ने उसे इमारत का नाम और दिशा निर्देश फोन पर ही दे दिए। दिए गए पते पर पहुँचा तो चौकीदार ने राजेश को घर की चाभी थमा दी। "घर कईं दिन से बन्द है। नालियों में पानी कईं दिन से रुका होगा, कुछ देर नल खुला छोड़ देना।" चौकीदार ने राजेश को समझाते हुए कहा।
"पानी सुबह कितने बजे आता है?", राजेश ने चौकीदार से पूछा।
"24 घंटे रनिंग वाटर है साहब", चौकीदार ने उत्तर दिया।
घर में सामान रखते ही राजेश ने रसोई और बाथरूम का नल खोल दिया। जैसा की चौकीदार ने कहा था, नल से कुछ बासी पानी बहने लगा। राजेश ने रसोई के स्लैब पर बैठ कर पिता जी को फोन लगाया...

"काम का पहला दिन कैसा रहा बेटा?" पिता जी ने पूछा।
"पापा! यहाँ 24 घंटे नल में पानी आता है।" राजेश ने उत्तर दिया।
"जुग जुग जियो बेटा... खूब तरक़्क़ी करो"। पिता जी का गला भर आया था। राजेश की आँखें भी नम हो गयीं। नल से अब साफ़ पानी बहने लगा था।

नकुल गौतम

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