लोग उसे कच्चा आम कहते थे।
पाँच बरस की उम्र में माता-पिता को खो देने का ग़म वो बर्दाश्त नहीं कर सका और उसका मानसिक विकास वहीं थम गया। हमेशा कच्चा आम चाटते हुए दिखाई देता। जहाँ मन करता पत्थर, कोयले या चॉक से दीवारों पर सुन्दर चित्र बना देता। माता पिता के साथ माता के मंदिर जाता रहा होगा, सो 'जय माता की' उसका तकिया कलाम बन गया था।
मंदिर किसी भी देवता का हो, दरगाह हो कि गुरुद्वारा, वो हर जगह अपने अंदाज़ में 'जय माता की' के नारे लगाता रहता।
तब वो शायद बारह बरस का था । उस दिन बर्फ गिर रही थी और वो हनुमान मंदिर की सीढ़ियों पर माता के जयकारे लगा कर किसी से प्रसाद मिल जाने की उम्मीद में बैठा था। सीढ़ियों पर सामने की पहाड़ी का नज़ारा वो चॉक से उकेर चुका था। तभी वो पहली बार उसे मिली थी और प्रसाद का स्वादिष्ट लड्डू दे गयी। उसने एक पल भी गँवाये बिना भूखे पेट मे लड्डू उतार दिया और "जय माता की" का नारा लगाया। भूख का असर कम हुआ तो उसने देखा, वो बच्ची कहीं नहीं दिख रही थी। "इतनी ठंड में भी स्वेटर नहीं पहनती", वो बड़बड़ाने लगा।
"स्कूल में छुट्टी होगी क्या...
सर्दियों में कच्चे आम क्यों नहीं मिलते...
वो इतनी सुबह घर से क्यों निकली होगी..."
वो अपनी कुटिया तक बड़बड़ाता हुआ गया था।
अब वो सत्तर साल का हो चुका है।
उसकी कुटिया के पास एक भवन में उसकी चित्रकारी की प्रदर्शनी बारह महीने लगी रहती है। जो भी देखने आता है, उसे भोजन, लड्डू, जरूरत के मुताबिक कपड़े या कच्चे आम दे जाता है।
"बाबा! आ जाइये।"
सुबह से जारी बर्फबारी के बीच रोज़ की तरह वो आज भी आयी। वही गोटे वाली चुनरी और लाल कुर्ती पहने और हाथ में प्रसाद लिये।
वो हमेशा की तरह खाने के लिये टूट पड़ा।
जब तक प्रसाद खाया रोज़ की तरह बड़बड़ाता रहा।
"स्वेटर क्यों नहीं पहनती...
स्कूल क्यों नहीं जाती...
रोज़ कहाँ गायब हो जाती है..."
फिर वो चिल्लाया
"सुनो!
कोई नहीं मानता कि यहाँ लोग आकर मुझे खाना देते हैं...
सब इस चित्र भवन को खंडर कहते हैं...
कोई नहीं मानता कि तुम यहाँ आती हो"...
फिर शांत होते ही मुस्कुराया और बड़बड़ाने लगा
"सर्दियों में कच्चे आम कहाँ से ले आती होगी"
वो खंडर के पत्थरों पर लेट गया और आम चाटने लगा। ~नकुल गौतम मौलिक एवं स्वरचित
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