"वाह! क्या महक है।"
मिठाइयों की महक आयी तो मिसेज़ शर्मा खिड़की से बाहर झाँकते हुए बोलीं। शर्मा परिवार क्रेसेन्ट अपार्टमेंट की पाँचवीं मंज़िल पर आलीशान फ्लैट में रहता है। सामने एक बस्ती है जहाँ बीस बाइस परिवार रहते हैं। इन घरों के मर्द आस पास की सोसाइटियों में माली या चौकीदार हैं तो महिलाएं घरों में काम कर के अपने परिवार चलाने में योगदान करती हैं।
लो, तुम्हारा वेज शिज़वान मंचूरियन आ गया। डोर बेल सुनते ही शर्मा जी घर के मुख्य द्वार की तरफ बढ़े।
मिसेज़ शर्मा वहीं खिड़की पर अपनी निगाहों से कुछ टटोल रही थीं। शर्मा जी भी उनके साथ आ खड़े हुए।
"त्योहार मनाना तो कोई इन गरीबों से सीखे। नवरात्रि में डांडिया हो, मकर सक्रांति में तिल-गुल या होली-दीवाली, ये लोग सब मिल जुल कर मनाते हैं। धूम धाम से। और एक हम लोग हैं जो इन बड़ी सोसाइटियों में मानो क़ैद हो कर राह गये हैं।" मिसेज़ शर्मा खुशी से बस्ती से उठती महक का मज़ा लेते हुए बोलीं।
"इन सब ढकोसलों के लिए खूब खर्च करते हैं ये लोग मगर कहने को गरीब हैं"। - शर्मा जी मंचूरियन का डिब्बा खोल कर मिसेज़ शर्मा की ओर बढ़ाते हुए बोले।
"त्योहार तो हम गरीबों के लिये होते हैं साहिब"।
पीछे सेंटर टेबल की धूल झाड़ते हुए बाई के हाथ शर्मा जी की यह बात सुन कर ठिठक गये थे।
"अमीर का तो जब दिल किया, पकाया मंगवाया और खा लिया। हम गरीब तो हर त्योहार के बाद अगले त्योहार का इंतज़ार करते हैं कि कुछ अच्छा खाएंगे।
सच कहूँ तो ये नियम या आपकी भाषा में ढकोसले, हम गरीबों के मन बहलाने के लिये ही बनाये गए हैं।"
मिसेज़ शर्मा बाई की संवेदना समझ कर मुस्कुरा रही थीं तो शर्मा जी की निगाहें शर्म से झुक गयी थीं। वेज शिज़वान मंचूरियन उस महक के सामने फीका पड़ गया था।
No comments:
Post a Comment