Tuesday, 1 September 2020

तथास्तु

 

कहते हैं कि ईश्वर केवल तथास्तु कहना जानते हैं। ईश्वर हर पल कहीं न कहीं किसी की बात सुन कर तथास्तु कहते रहते हैं। ऐसे में हर व्यक्ति की बारी कब आ जाये, कहा नहीं जा सकता।


शर्मा जी के जीवन में दो बार ऐसा हुआ और दोनों ही बार वो पछताये।

पहली बार ऐसा तब हुआ जब वे कॉलेज में थे और अपनी रईस प्रेमिका को रिझाने के लिये उन्होंने झूट कह दिया था कि वो किसी रियासत के राजकुमार हैं। जब कॉलेज खत्म होने को था तब वे सच सामने आ जाने के भय से ग्रसित हो गये। घबराहट में एक दिन सोचने लगे कि भांडा फूटने से पहले ही प्रेमिका विवाह के लिए इनकार कर दे तो वे बच जायें। दुर्भाग्यवश इसी दिन ईश्वर के यहाँ उनकी हाजिरी थी। ईश्वर ने तथास्तु कहा और अगले प्रार्थी की ओर मुड़ गये। अगले ही दिन प्रेमिका सॉरी कह निकल गयी। शर्मा जी वास्तव में ऐसा चाहते नहीं थे। वे तो बहुत प्रेम करते थे। बस घबराहट में ऐसा माँग बैठे थे। बहुत पछताये लेकिन अब तो चिड़िया खेत से फ़ुर्र हो चुकी थी। 
कई बरस बाद कल फिर उनकी बात पर ईश्वर ने तथास्तु कहा। सोते समय कॉलेज के दिनों को दिल में टटोलते हुए वे सोच रहे थे कि काश उसकी कोई खबर मिल जाय। ईश्वर ने फिर तथास्तु कहा। अगले दिन नाश्ते के बाद चाय के साथ अखबार पलटते हुए उनकी नज़र उस जानी पहचानी सूरत पर पड़ी। विवरण पढ़ते ही उन्होंने ऊपर सिर उठाया और ईश्वर को कोसने लगे।
अखबार पर तस्वीर के साथ विवरण था, "आप को भारी मन से सूचित किया जाता है कि हमारी माता जी का देहांत हो गया है। शोक सभा कल शाम को गुजराती समाज कल्याण भवन में आयोजित होगी। कृपया फोन न करें।

नकुल


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