Monday, 9 March 2020

महक


"वाह! क्या महक है।"

मिठाइयों की महक आयी तो मिसेज़ शर्मा खिड़की से बाहर झाँकते हुए बोलीं। शर्मा परिवार क्रेसेन्ट अपार्टमेंट की पाँचवीं मंज़िल पर आलीशान फ्लैट में रहता है। सामने एक बस्ती है जहाँ बीस बाइस परिवार रहते हैं। इन घरों के मर्द आस पास की सोसाइटियों में माली या चौकीदार हैं तो महिलाएं घरों में काम कर के अपने परिवार चलाने में योगदान करती हैं।

लो, तुम्हारा वेज शिज़वान मंचूरियन आ गया। डोर बेल सुनते ही शर्मा जी घर के मुख्य द्वार की तरफ बढ़े।

मिसेज़ शर्मा वहीं खिड़की पर अपनी निगाहों से कुछ टटोल रही थीं। शर्मा जी भी उनके साथ आ खड़े हुए।

"त्योहार मनाना तो कोई इन गरीबों से सीखे। नवरात्रि में डांडिया हो, मकर सक्रांति में तिल-गुल या होली-दीवाली, ये लोग सब मिल जुल कर मनाते हैं। धूम धाम से। और एक हम लोग हैं जो इन बड़ी सोसाइटियों में मानो क़ैद हो कर राह गये हैं।" मिसेज़ शर्मा खुशी से बस्ती से उठती महक का मज़ा लेते हुए बोलीं।

"इन सब ढकोसलों के लिए खूब खर्च करते हैं ये लोग मगर कहने को गरीब हैं"। - शर्मा जी मंचूरियन का डिब्बा खोल कर मिसेज़ शर्मा की ओर बढ़ाते हुए बोले।

"त्योहार तो हम गरीबों के लिये होते हैं साहिब"।

पीछे सेंटर टेबल की धूल झाड़ते हुए बाई के हाथ शर्मा जी की यह बात सुन कर ठिठक गये थे।

"अमीर का तो जब दिल किया, पकाया मंगवाया और खा लिया। हम गरीब तो हर त्योहार के बाद अगले त्योहार का इंतज़ार करते हैं कि कुछ अच्छा खाएंगे।

सच कहूँ तो ये नियम या आपकी भाषा में ढकोसले, हम गरीबों के मन बहलाने के लिये ही बनाये गए हैं।"

मिसेज़ शर्मा बाई की संवेदना समझ कर मुस्कुरा रही थीं तो शर्मा जी की निगाहें शर्म से झुक गयी थीं। वेज शिज़वान मंचूरियन उस महक के सामने फीका पड़ गया था।

Friday, 31 January 2020

कच्चा_आम


लोग उसे कच्चा आम कहते थे।

पाँच बरस की उम्र में माता-पिता को खो देने का ग़म वो बर्दाश्त नहीं कर सका और उसका मानसिक विकास वहीं थम गया। हमेशा कच्चा आम चाटते हुए दिखाई देता। जहाँ मन करता पत्थर, कोयले या चॉक से दीवारों पर सुन्दर चित्र बना देता। माता पिता के साथ माता के मंदिर जाता रहा होगा, सो 'जय माता की' उसका तकिया कलाम बन गया था।

मंदिर किसी भी देवता का हो, दरगाह हो कि गुरुद्वारा, वो हर जगह अपने अंदाज़ में 'जय माता की' के नारे लगाता रहता।

तब वो शायद बारह बरस का था । उस दिन बर्फ गिर रही थी और वो हनुमान मंदिर की सीढ़ियों पर माता के जयकारे लगा कर किसी से प्रसाद मिल जाने की उम्मीद में बैठा था। सीढ़ियों पर सामने की पहाड़ी का नज़ारा वो चॉक से उकेर चुका था। तभी वो पहली बार उसे मिली थी और प्रसाद का स्वादिष्ट लड्डू दे गयी। उसने एक पल भी गँवाये बिना भूखे पेट मे लड्डू उतार दिया और "जय माता की" का नारा लगाया। भूख का असर कम हुआ तो उसने देखा, वो बच्ची कहीं नहीं दिख रही थी। "इतनी ठंड में भी स्वेटर नहीं पहनती", वो बड़बड़ाने लगा।

"स्कूल में छुट्टी होगी क्या...
सर्दियों में कच्चे आम क्यों नहीं मिलते...
वो इतनी सुबह घर से क्यों निकली होगी..."
वो अपनी कुटिया तक बड़बड़ाता हुआ गया था।

अब वो सत्तर साल का हो चुका है।

उसकी कुटिया के पास एक भवन में उसकी चित्रकारी की प्रदर्शनी बारह महीने लगी रहती है। जो भी देखने आता है, उसे भोजन, लड्डू, जरूरत के मुताबिक कपड़े या कच्चे आम दे जाता है।

"बाबा! आ जाइये।"
सुबह से जारी बर्फबारी के बीच रोज़ की तरह वो आज भी आयी। वही गोटे वाली चुनरी और लाल कुर्ती पहने और हाथ में प्रसाद लिये।
वो हमेशा की तरह खाने के लिये टूट पड़ा।
जब तक प्रसाद खाया रोज़ की तरह बड़बड़ाता रहा।
"स्वेटर क्यों नहीं पहनती...

स्कूल क्यों नहीं जाती...
रोज़ कहाँ गायब हो जाती है..."

फिर वो चिल्लाया

"सुनो!
कोई नहीं मानता कि यहाँ लोग आकर मुझे खाना देते हैं...
सब इस चित्र भवन को खंडर कहते हैं...
कोई नहीं मानता कि तुम यहाँ आती हो"...

फिर शांत होते ही मुस्कुराया और बड़बड़ाने लगा
"सर्दियों में कच्चे आम कहाँ से ले आती होगी"

वो खंडर के पत्थरों पर लेट गया और आम चाटने लगा। ~नकुल गौतम मौलिक एवं स्वरचित

किशोर दा


राज़ हेयर ड्रेसर की कैंचियाँ संगीत की लय के साथ थिरकती हुईं बहुत शानदार रही थीं। रेडियो पर एक के बाद एक किशोर दा के गीत सुनाये जा रहे थे। जुनैद और दिनेश दोनों एक-एक अन्तरे का आनन्द ले रहे थे।

"फिर क्यों संसार की बातों से,
भीग गये तेरे नैना... कुछ तो लोग कहेंगे।

आहा...

"तेरी नज़र, बन के ज़ुबाँ, लेकिन तेरे पैग़ाम दिए जाये..
ये शाम मस्तानी, मदहोश किये जाय..."

क्या खूब...

इतने में रेडियो पर "आज के मुख्य समाचार" सुनाये जाने लगे। देश में फैल रहे द्वेष को लेकर मंत्री जी की चिंता का बयान सुनते ही जुनैद भड़क उठा। "सब इन्ही का तो किया धरा है", जुनैद बड़बड़ाया।

"सरकार जो कर रही है ठीक कर रही है। सत्तर साल से जो नहीं हुआ और जो सैंतालीस में हो जाना चाहिये था, वो आज हो रहा है", दिनेश बोला।

जुनैद भड़क गया - "तुम्हारी एक नहीं चलेगी। हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं"।

"बिल्कुल हमारे बाप दादाओं का है हिन्दुस्तान। ये हमारी मिट्टी है जिसे हम बर्बाद नहीं होने देंगे", दिनेश लगभग चिल्लाते हुए बोला।

रेडियो एंकर की मधुर आवाज में अगली उद्घोषणा हुई...
"आइये सुनते हैं अगला नगमा, किशोर कुमार की आवाज़ में। गीत लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसे संगीतबद्ध भी किशोर कुमार ने ही किया है। गीत के बोल..."कोई हमदम ना रहा..."

जुनैद और दिनेश फिर से गीतों में खो गये। कैंचियाँ फिर से सुरबद्ध लगने लगीं।

Tuesday, 28 January 2020

आबे रवां - "चौबीस घण्टे रनिंग वाटर" - विभोम स्वर जनवरी 2019


आबे रवां - "चौबीस घण्टे रनिंग वाटर"

आज राजेश का शहर और दफ़्तर दोनों में पहला दिन था। उसने ट्रेन से उतरते ही ब्रोकर को फोन किया और याद दिलाया कि शाम पाँच बजे उसे घर की चाभियाँ मिल जानी चाहियें। स्टेशन से रिक्शा लेकर अपने दफ़्तर के पते पर गया और सुनिश्चित किया कि वह दफ़्तर की इमारत को पहचान ले।

"पहले दिन पर कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए", राजेश ख़ुद को समझा रहा था।

अभी सात ही बजे थे, सो वह नज़दीक ही एक सराय में फ्रेश होने चला गया। इस सराय में लोग सिर्फ नहाने के लिए आते हैं। मुम्बई में ऐसे कईं गेस्ट हाउस हैं जहाँ लोग केवल फ्रेश होने ही आते हैं, और फिर अपने काम पर निकल जाते हैं। राजेश को इस सराय की जानकारी ब्रोकर से ही मिली थी। डोरमेट्री में सामान रखकर नहाने जाते हुए उसे अपने सामान की चिंता हो रही थी, मगर उसके पास कोई चारा नहीं था। बाथरूम में बड़े बड़े अक्षरों में "पानी का सदुपयोग" करने की अपील दर्ज थी लेकिन इस बोर्ड के ठीक नीचे का नल खराब होने की वजह से लगातार टपक रहा था। नहा धोकर निकला तो साढ़े आठ हो गए थे। अपना सामान क्लोक रूम में रखकर वह दफ़्तर पहुँच गया।

ऑफिस के ब्रेकआउट एरिया में पानी का एक डिस्पेंसर लगा हुआ था। राजेश ने देखा कि एक व्यक्ति ने पानी का आधा गिलास पिया और आधा सिंक में उढेल दिया। राजेश को यह बहुत अजीब सा लगा।

"कल हमारी बिल्डिंग में पानी सिर्फ़ आठ घण्टे आया, यू क्नो", रिसेप्शन से गुज़रती हुई एक महिला अपनी सहेली से बतिया रही थी।
"सिर्फ़ आठ घंटे"... राजेश यह सुनकर चौंक सा गया। राजेश के मन में उसकेे बचपन से लेकर जवानी तक का फ़्लैश बैक चलने लगा...

राजेश को यह याद नहीं था कि वह पहली बार पिता जी के साथ पानी भरने कब गया था। होश संभाला तो हाथ में डालडा का डिब्बा लियेे अपने बड़े भाई-बहन के साथ पानी भरने हैण्ड पंप पर खड़ा था। हर रोज़ सुबह जागता तो घर में चले 'पानी भरो आंदोलन' में शामिल हो जाता। माँ रसोई में मोर्चा संभाले खड़ी होती, और पिता जी हैण्ड पम्प पर। तीनों भाई बहन हैण्ड पम्प से घर तक डिब्बों में पानी ढोते। हैण्ड पम्प पर सलीक़े से पूरे मोहल्ले की बाल्टियाँ एक क़तार में लगी होती थीं। जल भरो आंदोलन युद्ध स्तर पर चलता। न जाने कितनी पानीपत की लड़ाइयों का गवाह था यह हैण्ड पम्प। कभी कभी हैंडपम्प भी सूख जाता तो गाँव से बाहर किसी हैंडपम्प की खोज की जाती। स्कूटर पर किसी तरह दोनों बाप बेटे चार डिब्बे पानी भर लाते। घर में म्युन्सिपल्टि का नल था जो केवल तीस मिनट तक अपने गले से आवाज़ें निकालता था। माँ इस नल को निचोड़ कर एक बाल्टी तो भर ही लेती थीं।

कुछ बड़े हुए तो पिता जी ने घर के आँगन में एक टैंक बनवाने की सोची। इसके लिए स्लैब बना ही था कि शहर से चाचा जी का फोन आ गया। बिना उनकी इजाज़त के टैंक बनवाने की योजना पर उन्हें आपत्ती थी। कईं साल स्लैब आँगन में बिना टैंक के खड़ा रहा। हाँ, इस स्लैब पर बड़े होते राजेश और उसके मित्र बहुत खेलते। घर-घर खेलने के लिए एक उपयुक्त स्थान बन गया। जब तक जवानी आई, इस स्लैब पर पिता जी ने अपने खर्च पर दो टैंक रखवा दिए, और इनमे से एक पर चाचा जी के घर का नम्बर लिखवा दिया। अब चाचा जी को कोई आपत्ती नहीं थी क्योंकि बिना जेब ढीली किये एक टैंक मिल गया था।

लेकिन ये टैंक कभी पूरे नहीं भरे। अब सुबह उठते ही राजेश का पहला काम स्लैब पर चढ़ कर टैंक में पानी का स्तर देखने का होता था। बहन की शादी हो चुकी थी और पिता जी में अब उतना ज़ोर नहीं था। दोनों भाइयों पर इन टैंकों में इतना पानी जमा करने का जिम्मा था कि पूरा दिन निकल जाये। कभी किसी रबड़ की नाली में अपने फेफड़ों के ज़ोर से हवा खींचते तो कभी हैण्ड पम्प से भरकर बाल्टियाँ खींचते, मगर ये टैंक कभी पूरे नहीं भरे। पानी का दबाव इतना कम रहता था कि रसोई का नल खुलता तो बाथरूम में पानी बन्द हो जाता। पिता जी दाढ़ी बनाते हुए अक्सर चिल्लाते थे, "अरे कोई रसोई का नल बन्द करो"।

बरसात में एक टिन का ड्रम छत के किनारों से गिरते पानी से भर लिया जाता था। शौचलय में यही पानी इस्तेमाल किया जाता था। फ्लश नामक उपकरण केवल मेहमानों के लिए ही लगवाया गया था। अगर किसी घर के सदस्य ने गलती से फ्लश चला दी तो पिता जी दो घंटे तक प्रवचन देते थे। मेहमानों को भी पिता जी "जल ही जीवन है" पर उपदेश दिया करते थे। बुआ जी एक दो दिन के लिये आतीं तोे कभी नहाती ही नहीं थी। पता नहीं कब क्या उपदेश मिल जाए।

शहर में नौकरी मिलने पर भी राजेश को यही चिंता सता रही थी कि आखिर भाई अकेले पानी कैसे भरेगा। पिता जी भी राजेश के लिये चिंतित थे।

"सुबह उठ कर समय से पानी भर लिया करना। सोये मत रहना", पिता जी का प्यार भी डाँट के रूप में ही बरसता था।

शाम पाँच बजते ही राजेश ने ब्रोकर को फोन किया। ब्रोकर ने उसे इमारत का नाम और दिशा निर्देश फोन पर ही दे दिए। दिए गए पते पर पहुँचा तो चौकीदार ने राजेश को घर की चाभी थमा दी। "घर कईं दिन से बन्द है। नालियों में पानी कईं दिन से रुका होगा, कुछ देर नल खुला छोड़ देना।" चौकीदार ने राजेश को समझाते हुए कहा।
"पानी सुबह कितने बजे आता है?", राजेश ने चौकीदार से पूछा।
"24 घंटे रनिंग वाटर है साहब", चौकीदार ने उत्तर दिया।
घर में सामान रखते ही राजेश ने रसोई और बाथरूम का नल खोल दिया। जैसा की चौकीदार ने कहा था, नल से कुछ बासी पानी बहने लगा। राजेश ने रसोई के स्लैब पर बैठ कर पिता जी को फोन लगाया...

"काम का पहला दिन कैसा रहा बेटा?" पिता जी ने पूछा।
"पापा! यहाँ 24 घंटे नल में पानी आता है।" राजेश ने उत्तर दिया।
"जुग जुग जियो बेटा... खूब तरक़्क़ी करो"। पिता जी का गला भर आया था। राजेश की आँखें भी नम हो गयीं। नल से अब साफ़ पानी बहने लगा था।

नकुल गौतम

अपना_डिब्बा


हाँफते हुए बोगी में चढ़े बुज़ुर्ग के चेहरे के भाव साफ बता रहे थे कि उन्हें अपनी गलती का एहसास भी है और पछतावा भी। लेकिन गाड़ी चल चुकी है तो अब जनरल डिब्बे में जाने के लिये अगले स्टेशन तक यहीं रुकना होगा।

न जाने क्या मजबूरी रही होगी। क्यों देर हुई होगी। बड़ी तेज़ी से भागे होंगे। जैसे ही प्लेटफॉर्म पर पहुँचे होंगे तो गाड़ी छूट रही होगी। तभी तो ए.सी. कोच में चढ़ गये होंगे।

कुछ देर की परेशानी के बाद उन्होंने डिब्बे को ध्यान से देखा। बहुत हैरत से इस कोच में उपलब्ध सुविधाओं का जायज़ा लिया। चारों ओर पसरे सुकून को देखा। कोई जगह खाली नहीं थी लेकिन डिब्बा खाली ही लग रहा था। उन्हें बैठना नहीं था, लेकिन सब कुछ देखने की चाह थी।

टिकट चेकर के आते ही उन्होंने साफ साफ अपना पक्ष रख दिया। अफसर अच्छा था और उसने उन्हें जनरल डिब्बे के पास लगे शटर के पास जाकर खड़े होने की हिदायत दी। जुर्माने का ज़िक्र भी नहीं किया। कोच में किसी ने भी बुज़ुर्ग पर ध्यान तक नहीं दिया। सभी अपने फोनों को अपने अँगूठों, उँगलियों से सहलाते रहे।

कुछ देर में अफसर ने पैंट्री कर्मचारी को हिदायत दी और उसने शटर खोल दिया। जनरल डिब्बा खचाखच भरा हुआ था। बुज़ुर्ग के प्रवेश करते ही "कहाँ जाएंगे चाचा", "कहाँ चढ़ गये थे अंकल", "गिर मत जाना" जैसे वाक्यों से भीड़ ने स्वागत किया। ये सब अनजान आवाज़ें अपनी सी लग रही थीं। एक महिला ने उठते हुए कहाँ, "आओ अंकल, यहाँ बैठ जाओ"। बुज़ुर्ग भी अब असहज नहीं लग रहे थे।

लव_यू_ज़िन्दगी


"अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ
अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूँ"

जगजीत सिंह जी की आवाज़ में ग़ज़ल सुनते हुए शर्मा जी की आँखें नम हो गयी थीं। उन्हें अपने बचपन से लेकर कॉलेज के हॉस्टल तक सब कुछ याद आ रहा था। जब से शहर में एक कमरे का मकान लिया था तब से बैंक की किश्तों के बोझ तले उनकी पूरी पगार दब कर रह गयी थी। मिसेज़ शर्मा भी इस संघर्ष में उनका साथ निभाने के लिये हर मुमकिन प्रयास करती थीं। हर साल मिलने वाला दीवाली बोनस भी बैंक में देकर शर्मा दम्पति जल्द से जल्द लोन चुकाने की कोशिश में थी।

इस बार दीवाली बोनस आते ही शर्मा जी धर्मपत्नी को बिना बताए राजस्थान में छुट्टी बिताने का बंदोबस्त कर आये। शुरू में मिसेज़ शर्मा कुछ नाराज़ हुईं, लेकिन जब शर्मा जी ने यह विश्वास दिलाया कि लोन लगभग चुका दिया गया है, तो बहुत खुश हुईं। पूरे सप्ताह की छुट्टी के दौरान शर्मा जी धर्मपत्नी को खुश देखकर कितने खुश थे। उस दिन जैसलमेर के रेत के टीलों पर बारिश हुई। कितना अद्भुत नज़ारा था। मिसेज़ शर्मा कितनी देर फोन पर बेटी से बातें करती रहीं और रेगिस्तान में हुई बारिश का आंखों देखा विवरण देती रहीं। शर्मा जी को रह रह कर पत्नी से लोन के बारे में कहा झूट याद आता और फिर पत्नी की खुशी देख कर सब भूल जाते। छुट्टी खत्म होने पर वापसी विमान से थी। हवाई जहाज़ में चढ़ते हुए मिसेज़ शर्मा की आंखों में खुशी के आँसू आ गये। "लव यू ज़िन्दगी"... शर्मा जी मन ही मन कह रहे थे।

~नकुल गौतम

ऊँचे नीचे कन्धे


पार्टी शुरुअ होने में अभी कुछ वक्त था। मेहमानों के आने का सिलसिला जारी था।

सरिता की सहेलियाँ घर के ड्राइंग रूम में सजे वॉल हैंगिंग की तारीफ़ें कर रही थीं। एक सहेली ने तारीफ़ करते हुए सरिता से कहा, "बेटियाँ घर मे रौनक बनाये रखती हैं। तुम्हारी बेटी भी सयानी हो गयी है। देखो कितना खूबसूरत वॉल हैंगिंग बनाया है।"

"नहीं नहीं। यह बिटिया ने नहीं, मेरे बड़े बेटे ने बनाया है।" सरिता ने सफ़ाई देते हुए कहा।
"देखो कैसे लड़के को लड़कियों के काम सिखा रही है।" अब सरिता की सहेलियाँ कानाफूसी कर रही थीं।
"जाने कब लड़के लड़कियों का अंतर खत्म होगा। अगर लड़कियों को आगे बढ़ने का हक है तो लड़कों को भी तो ये सब सीखने का हक है"। सरिता ने डाँटने के अंदाज़ में सहेलियों से कहा। किटी पार्टी का रंग आज फ़ीका सा था।

नकुल गौतम

मैं वापिस आऊंगी

 मेरा नाम इतना भी कॉमन नहीं है कि किसी और की जगह मुझे ईमेल आ जाए। फिर दफ्तर में हमारा इंटरेक्शन भी अब उतना नहीं था। उस दिन अचानक जब उसका ईमे...