Tuesday, 28 January 2020

ऊँचे नीचे कन्धे


पार्टी शुरुअ होने में अभी कुछ वक्त था। मेहमानों के आने का सिलसिला जारी था।

सरिता की सहेलियाँ घर के ड्राइंग रूम में सजे वॉल हैंगिंग की तारीफ़ें कर रही थीं। एक सहेली ने तारीफ़ करते हुए सरिता से कहा, "बेटियाँ घर मे रौनक बनाये रखती हैं। तुम्हारी बेटी भी सयानी हो गयी है। देखो कितना खूबसूरत वॉल हैंगिंग बनाया है।"

"नहीं नहीं। यह बिटिया ने नहीं, मेरे बड़े बेटे ने बनाया है।" सरिता ने सफ़ाई देते हुए कहा।
"देखो कैसे लड़के को लड़कियों के काम सिखा रही है।" अब सरिता की सहेलियाँ कानाफूसी कर रही थीं।
"जाने कब लड़के लड़कियों का अंतर खत्म होगा। अगर लड़कियों को आगे बढ़ने का हक है तो लड़कों को भी तो ये सब सीखने का हक है"। सरिता ने डाँटने के अंदाज़ में सहेलियों से कहा। किटी पार्टी का रंग आज फ़ीका सा था।

नकुल गौतम

प्रेम की मिसाल


विवाह समारोह के सम्पन्न होने के बाद से ही दूल्हे के पिता, जो शहर के बड़े जाने माने नेता भी हैं, बहुत उत्साहित थे। उन्हें अगले दिन के अखबार की प्रतीक्षा थी। उनके बेटे ने एक पीड़ित दलित महिला से प्रेम विवाह कर के मिसाल जो कायम की थी।

अगले दिन के अखबार युवा नेता के विवाह की खबरों से पटी पड़े थे। सभी अख़बार "युवा नेता ने की दलित से शादी", "नेता जी ने गिराई ऊँच नीच की दीवार" जैसी सुर्खियों से सजे हुए थे। नयी नवेली दुल्हन को उदास देख युवा नेता ने उदासी का सबब पूछा। "क्या खबरों में मेरे दलित होने का ज़िक्र ज़रूरी था। हमारे विवाह से हमारी जातियों का क्या लेना देना। हम कॉलेज से दोस्त हैं और हमने विवाह का निर्णय जाति की वजह से तो नहीं लिया।"

अगर तुम दलित न होती तो इतनी खबरें थोड़े ही छपती। और आने वाले चुनाव में मुझे भी टिकट मिलने वाला है। देखो तुम्हारी जाति के सभी वोट मुझे ही मिलेंगे।

दुल्हन के सवालों पर युवा नेता मुस्कुरा कर बोला।

ऐसे ही पिता जी हमारे विवाह के लिए राज़ी नहीं हुए। और इस समय पर हमारा विवाह भी कोई संयोग नहीं। यह तिथि भी पार्टी के उम्मीदवार घोषित होने से ठीक पहले पूरे सोच विचार के बाद निकलवाई गयी थी।

दुल्हन अपने प्रेम को नेता में बदलते देख हैरान थी।

नकुल गौतम

बासी दीवाली


सुबह सुबह पड़ोस की बस्ती के बच्चे सोसाइटी कंपाउंड में चले आये हैं। सब की नज़र से बच कर किसी के भी उठने से पहले, पटाखों के कचरे में से कुछ बचे हुए पटाखे चुनने।

ये पटाखे उनके लिए सोने के सिक्कों से हैं। अब वो अपनी दीवाली मनाएंगे

~नकुल गौतम

हिल स्टेशन


बर्फ़ से ढके देवदार के पेड़ चांदनी रात में चमक रहे थे। पूरा शहर रात में बत्तियों से जगमगा रहा था।

"मैं एक अरसे से तुम्हारे साथ इस जगह शहर में एक हसीं शाम गुज़ारना चाहता था। पूरी उम्र गुज़र गयी पर कभी जेब ने साथ नहीं दिया। आज की यह शाम मेरे लिए वाक़ई बहुत ख़ास है।" शर्मा जी की आँखें नम होने लगीं। पत्नी भी उनके काँधे पर सिर रख कर उनकी बातें सुन रही थी ।

कितने बरस बीत गए। याद है ब्याह के बाद हम यहाँ घूमने आये थे। होटलों की कीमतें बहुत अधिक थीं, तो शहर से बाहर किसी सराय में रुकना पड़ा था।
हाँ, और आपने गोंद की डिबिया को नारियल तेल की शीशी समझ कर... दोनों ज़ोर से हँस पड़े।

शोर सुनकर नर्स ने दरवाज़ा खोला। "आप लोग सो जाइए। कहीं ब्लड प्रेशर बढ़ गया तो कल सर्जरी नहीं हो पायेगी।" नर्स हिदायत देकर चली गयी।

सब कमरों की बत्तियाँ बन्द हो चुकी हैं। सिर्फ़ शर्मा जी के कमरे की बत्ती जली हुई है। अस्पताल के अँधेरे, सुनसान गलियारे इनकी गुफ्तगू दूर तक सुनाई दे रही है।

" चलो इसी बहाने हमारी ये इच्छा तो पूरी हुई"।

~नकुल गौतम

पापा_की_चिट्ठी


खेल के मैदान के साथ ही मेरी दुकान हुआ करती थी।

उस दिन एक पाँच-छः वर्ष का बच्चा एक पुराना सा अंतर्देशीय पत्र लिये सड़क पर बहुत असमन्जित सा इधर उधर देख रहा था।

"क्या हुआ बेटे" मैंने आवाज़ देकर उस से पूछ ही लिया।
"मुझे अपने पापा को चिट्ठी डालनी है" बच्चे ने थोड़ा घबराते हुए उत्तर दिया।

ध्यान से देखने पर पता चला कि जो अंतर्देशीय पत्र उसके हाथ में है, वह किनारों से काट कर खोला गया है और डाकखाने की मुहर भी लगी हुई है।

"चिट्ठी लिख कर लाये हो", मैंने फिर पूछा।
उसकी आंखें बहुत कुछ कह रही थीं पर मैं सबकुछ समझ नहीं पा रहा था।
"मुझे दिखाओ" मेरे कहते ही बच्चे ने चिट्ठी मेरी ओर बढ़ाई। चिट्ठी पर हमारे ही गाँव का पता दर्ज था। शायद यह चिट्ठी उस बच्चे के घर आई कोई पुरानी चिट्ठी थी जिसे यह उठा लाया था। कहीं कोई ज़रूरी चिट्ठी तो नहीं। बहुत से ख़याल मन मे आये। उलट पलट कर देखा लेकिन किसी और कि चिट्ठी पढ़ तो नहीं सकता था। समझाने की कोशिश व्यर्थ थी क्योंकि बच्चा पापा को चिट्ठी भेजने की ज़िद पर अड़ा था।

बहुत सोच विचार के बाद मैंने अपनी दुकान से एक नया लिफ़ाफ़ा लिया और उस पर वही नाम पता लिख दिया जो उस चिट्ठी पर लिखा था। इस लिफ़ाफ़े में वह पुरानी चिट्ठी और साथ में एक छोटी पर्ची डाल दी जिस पर छपा था, "डिअर सन, विथ लव... पापा"।

यह लिफ़ाफ़ा बच्चे को देकर मैंने उसे डाकखाने का लाल डिब्बा दिखाया। "जाओ, इसे उस डिब्बे में डाल दो... रुको, मैं भी आता हूँ।" और मैंने उसी के हाथ से वह चिट्ठी बक्से में डलवा दी। चिट्ठी डाल कर बच्चा खुशी से उछलता हुआ मैदान में भाग गया।

उम्मीद है कि चिट्ठी जिसकी थी, उसे दोबारा मिल गयी होगी, और बच्चा भी पापा का जवाब देख खुश हुआ होगा। हाँ, क्योंकि टिकट लेने का वक़्त नहीं था, सो चिट्ठी बैरंग मिली होगी। हा हा, लेकिन क्या करता। चलिये सॉरी।

~नकुल गौतम

किश्ती


वो किश्ती सिर्फ सात रुपये की थी।

बचपन में हमारे गाँव में लगने वाले मेले की जब भी याद आती है तो वो सात रुपये की किश्ती जो पानी के टब में गोल चक्कर लगाती थी, मेरे मस्तिष्क में घूमने लगती है। पिता जी ने उसकी कीमत पूछी और मुझ से कहा कि यह तो एक दो दिन में खराब हो जायेगी। उस पर डालडा या मोमबत्ती जलाते हुए हाथ भी जल सकता है। यह किश्ती एक चम्मच में छोटी मोमबत्ती या डालडा जला कर ही काम करती थी।

मुझे समझा कर सांत्वना में एक गुब्बारा दिलवा दिया गया था। लेकिन वो पल बालमन में हमेशा के लिये फ्रेम हो गया। आज मैं अच्छा खासा कमा लेता हूँ, लेकिन वो किश्ती मेले में नहीं मिलती। ऑनलाइन मिल भी जाती है लेकिन मुझे मेले से ही लेनी थी। आज जब एक बच्चे के अंतरिक्ष ज्ञान की खबरें पढ़ता या सुनता हूँ तो लगता है कि उस बच्चे ने मेले से दूरबीन खरीदी होगी। उसके पिता खरीद पाये होंगे।

नकुल गौतम

Wednesday, 18 April 2018

ब्लैक एन्ड व्हाइट - अप्रैल 2018 विभोम स्वर


बहुत दिनों के बाद अजय स्टोर रूम में गया। दरवाज़ा खुलते ही सीलन की गंध ने नाक पर हमला किया। दीपावली की सफाई की शुरुआत यहीं से होती है। दशहरे के दिन स्टोर रूम में भरे गत्ते के डिब्बे, ख़ाली बोतलें और अन्य धातु के सामान निकाल कर अजय रद्दी वाले को देता है। इसके साथ ही वार्षिक सफाई अभियान के लिये उपयोग में आने का सामान जैसे पुताई के लिए खाली ड्रम, ब्रश, लम्बे बांस के डंडे, लोहे के ब्रश वगैरह भी तो स्टोर में ही रहते हैं। स्टोर के पिछली तरफ बहती नाली की वजह से यहाँ काफी सीलन रहती है। एक मात्र रौशनदान के सामने भी एक पुरानी अलमारी रखी हुई है जिसमे कुछ ग़ैर ज़रूरी सामन भरा हुआ है। इस रौशन दान से हल्की रौशनी के साथ नाली की नम हवा स्टोर में आती रहती है। अजय ने बत्ती जलाई और रद्दी अखबार और डिब्बे बटोरने लगा। तभी एक बूढी सी कराह ने अजय को आकर्षित किया। उसे लगा जैसे किसी ने उसका नाम बुदबुदाया हो। क.. क... कौन है, कौन है यहाँ? अरे अजय! तुम मुझे सुन पाये। म म.. मैं हूँ... ठीक तुम्हारे सामने। अजय को महसूस हुआ कि अलमारी के दरवाज़े की झिर्री से एक मन्द सी आवाज़ आ रही है। अजय ने घबराते हुए अलमारी का दरवाज़ा खोला। क कौन है। अजय ने फिर कहा। अरे मैं हूँ भाई। एक सफ़ेद कपड़े पर एक बिल्ली का चित्र ज़रा सा फड़फड़ाया। यह चित्र इस कपड़े पर अजय ने ही बचपन में बनाया था। माँ ने इसे टीवी पर डाल कर टीवी का कवर बना दिया था। क कौन? तुम... तुम टीवी बोल रहे हो क्या? पर तुम तो कब से खराब.. ? हाँ। मैं ही हूँ। मेरी स्क्रीन में कुछ खराबी थी, कम वोल्टेज में मेरे परदे पर फ़िल्में कभी कभी ऊपर नीचे हुआ करती थीं। लेकिन मेरे स्पीकर तो ठीक ही थे। कहो क्या कहना चाहते हो। अजय, मैं यहाँ पड़ा पड़ा उकता गया हूँ। मुझे यहाँ से बाहर निकलना है। इस बार मुझे भी कबाड़ी को बेच दो। अरे! मैं तुम्हे कैसे बेच सकता हूँ। तुम्हारे साथ कितनी यादें जुड़ी हैं हमारी। यादें... यादें ही तो हैं। क्या फर्क पड़ता है। मुझे अब यहाँ नहीं रहना। क्यों फर्क नहीं पड़ता। तुम तो एक मशीन हो, तुम्हे जज़्बातों की कीमत नहीं मालूम, इसी लिए ऐसा कह रहे हो। जज़्बात? तुम्हे मेरे जज़्बातों की परख कहाँ है अजय। मैं तुम्हारी आहट से तुम्हे पहचान लेता हूँ। तुम चलना भी नहीं जानते थे जब तुम्हारे पिता मुझे खरीद लाये थे। सन तिरासी का जून महीना था। भारत वर्ड कप के सेमी फाइनल में जीत चुका था। सब लोग रेडियो पर ही कॉमेंट्री सुना करते थे। तुम्हारे पिता जी फाइनल देखने के लिए मुझे खरीद लाये थे। मगर... मगर क्या? वही हुआ जो तब अक्सर हुआ करता था। दूरदर्शन का संपर्क लंदन से टूट गया। मुझे बहुत दुःख हुआ था कि मैं पूरा मैच नहीं दिखा सका। तुम्हारे पिता जी भी गुस्से से लाल हो गए। खैर रेडियो सुनते हुए पता चला कि भारत जीत गया है। तुम्हारे पिता जी ने यह खबर सुनकर मुझे और दूरदर्शन को क्षमा कर दिया था। अरे वाह। यह किस्सा तो मैंने कभी सुना ही नहीं। तुम्हें कैसे पता होगा। तुम बहुत छोटे थे तब। और कुछ सुनाओ ना। उसके बाद शाम की ख़बरें, शुक्रवार की फ़िल्में, रविवार का चित्रहार और वो काली सफ़ेद पट्टियाँ तुम्हारे परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बने और धीरे धीरे मैं तुम्हारे परिवार में शामिल हो गया। काली- सफ़ेद पट्टियाँ? हाँ, ये पट्टियाँ टीवी पर तब दिखती थीं जब कुछ प्रसारित नहीं हो रहा होता था। इसके अलावा किसी फ़िल्म के बीच में "रुकावट के लिए खेद है " का सन्देश एक लोकोक्ति की तरह हमारे परिवार में प्रयोग होने लगा। और क्या याद है तुम्हे? बहुत सी यादें हैं, जैसे रामायण का प्रसारण। तुम लोग मुझे घर के आँगन में लगा देते थे और पूरा मोहल्ला रामायण देखता था, और मैं पूरे मोहल्ले को निहारता था। एक दिन बिजली नहीं थी जब पड़ोस का विक्की कहीं से कार की बैटरी लाया था, और पूरे मोहल्ले ने बैटरी से मुझे कनेक्ट कर के रामायण देखी थी। सचिन का पहला मैच भी मेरी यादों में एक अहम जगह रखता है, जिसमें हल्की हल्की मूछों वाला वो छोटा सा लड़का उन पाकिस्तान के ऊँचे कद के खिलाड़ियों के सामने एक शेर की तरह खड़ा हुआ था। तुम तो ऐसे खुश होते थे जैसे तुम ही सचिन तेंदुलकर हो। हा हा। हाँ वो भी कमाल के दिन थे... मेरे बचपन के दिन। बचपन नहीं, लड़कपन। एंटीना ठीक करने के बहाने तुम पड़ोस की छत पर धूप सेंकती लड़कियों को निहारते थे। "क़यामत से क़यामत तक" देखने के लिए तुम वी सी आर किराये पर लाये थे। जब नया नया केबल टीवी शुरुअ हुआ था, तब तुम छत से जाने वाली केबल को मेरे एंटीना की तार से जोड़ कर फ़िल्में देखते थे। "हम आपके हैं कौन", याद है तुम्हें? हाँ हाँ, सब याद है। कितनी फ़िल्में, कितने मैच इसी तरह देखे थे। एक दिन मैंने और पिता जी ने मिलकर एक ही दिन में तीन फ़िल्में निपटाई थीं। हा हा। हाँ... महाभारत, सुरभी, मालगुड़ी डेज़, अलिफ़ लैला, जंगल बुक, चन्द्रकांता, शक्तिमान, सिगमा, अंताक्षरी और सारेगामा। कितने मज़े से तुम सब मिलकर देखते थे। फिर क़स्बे में बिजली की कमी होने लगी। तुम लोग मेरे लिए स्टेब्लाइज़र नहीं लाये और मेरी स्क्रीन ख़राब होने लगी। तुम्हारे परिवार की लापरवाही की सज़ा मुझे ही मिलने लगी। जब भी फ़िल्म क्लाइमेक्स की तरफ़ बढ़ती तो मेरी स्क्रीन के चित्र टेढ़े होने लगते, और तुम मेरे सिर पर ज़ोर से हाथ मारते। दरअस्ल उस समय वोल्टेज कम होती थी, और तुम सब मुझे ही दोष देते थे। अरे हाँ। मुझे तब तक वोल्टेज की कमी के बारे में कुछ नहीं मालूम था। जब इन्जीनीरिंग की पढ़ाई की तब समझ।में आया। फिर सत्तानवे का क्रिकेट वर्ल्डकप आ गया और तुम अपने पिता जी के साथ जा कर नया टीवी ले आये। मैं बहुत दुखी हुआ था। सुना है उस वर्ल्डकप में भारत का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं रहा था। हाँ। बहुत बुरा हुआ। तुमने नहीं देखा था क्या? मैं कैसे देखता भला। बीस साल से यहीं स्टोर में पड़ा हूँ। बस इतना पता है कि वह टीवी भी तुमने दो हज़ार ग्यारह में बदल लिया है। वह भी चौदह साल तुम्हारे ड्राइंग रूम में था और मैं भी। फ़र्क़ बस इतना है कि उसे तुमने एक्सचेंज में आज़ादी दी, और मैं पिछले बीस साल से यहाँ स्टोर में पड़ा हूँ। अरे भाई ऐसा नहीं है। उस टीवी से हमारी उतनी यादें नहीं जुड़ी थीं जितनी तुमसे। और आजकल नए दौर के टीवी हैं। हलके भी हैं और पतले भी। एक दीवार पर तस्वीरों की तरह लटका सकते हैं। तुम्हे पता है.. हमारे घर के हर कमरे में अब एक टीवी है। हाँ! मुझे सब पता है। अब न वो महफ़िलें हैं और न परिवार के साथ देखने लायक कार्यक्रम। समाचार भी व्यावसायिक होते जा रहे हैं। थोड़ा रुक कर टीवी ने फिर से अपनी बात दोहराई: सब नए टीविओं के डिब्बे यहीं स्टोर में तो रक्खे थे। पिछले दशहरे पर तुमने सब निकाल कर कबाड़ी को दे दिए। इस बरस मुझे भी दे दो। कब तक यहाँ पड़ा रहूँगा। लेकिन तुम्हे तो अब कबाड़ी भी नहीं लेगा। तुम्हारे समय की टेक्नोलॉजी अब पुरानी हो गयी है। तुम्हारे पुर्ज़े भी किसी काम के नहीं और तुम्हारी ब्लैक एन्ड व्हाइट स्क्रीन भी अब बस काँच का एक टुकड़ा भर है। अरे कितना वक़्त लगाओगे अजय। जल्दी कबाड़ बाहर निकालो। पिता जी की आवाज़ ने अजय का ध्यान खींचा। टीवी को उदास देखकर अजय ने टीवी को उठाया और बाहर आ गया। अरे, इसे क्यों उठा लाये। कबाड़ी ने कहा। इसका तो मैं एक रुपया भी नहीं दूंगा। अजय ने अपनी जेब से पचास रूपये निकाल कर कबाड़ी को दिए और कहा, "इसे ज़रा प्यार से ले जाना"। कुछ ही देर में कबाड़ी की साइकिल के पीछे बंधा टीवी आज़ादी की साँसे लेता हुआ अपने अंतिम सफ़र पर निकल गया। जाते हुए वह उस घर और आँगन को अपनी ब्लैक एन्ड व्हाइट स्क्रीन पर लगे नीले चश्मे में से निहारता रहा जिसमे उसने अपना स्वर्ण काल बिताया था। नकुल

मैं वापिस आऊंगी

 मेरा नाम इतना भी कॉमन नहीं है कि किसी और की जगह मुझे ईमेल आ जाए। फिर दफ्तर में हमारा इंटरेक्शन भी अब उतना नहीं था। उस दिन अचानक जब उसका ईमे...