Friday, 21 March 2025

मैं वापिस आऊंगी

 मेरा नाम इतना भी कॉमन नहीं है कि किसी और की जगह मुझे ईमेल आ जाए। फिर दफ्तर में हमारा इंटरेक्शन भी अब उतना नहीं था।

उस दिन अचानक जब उसका ईमेल आया तो मैं चौंक गया। बहुत सारे नामों की फेहरिस्त के अंत में था मेरा नाम। जैसे जान बूझ के लिखा हो, और बाद में हटाना भूल गई हो। मेरा नाम उसके आउटलुक की कैश में इतने साल बाद भी मौजूद है।

किसी के सवाल के जवाब में उसने लिखा था, "आय विल गेट बैक टू यू"। 

फैमिली यूनिट

 फैमिली यूनिट


"मम्मी हमें फोर्थ क्लास में भी फैमिली यूनिट के बारे पढ़ाया था और फिफ्थ में भी यही सब पढ़ा रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली, जॉइंट फैमिली पढ़ पढ़ कर मैं बोर हो गया हूँ।"


बिट्टू की बात सुन माँ मुस्कुरा रही थी।


"इस से अच्छा तो फैमिली इशुज़ के बारे पढ़ाना चाहिए स्कूल में। हाऊ टू डील विथ जनरेशन गैप इन फॅमिली। है ना मम्मी?"


बिट्टू की बात सुन माँ की आँखें नम हो गईं।


~नकुल गौतम

त्यौहार

 #त्योहार


"बड़े तेज़ कदमों से बाज़ार की तरफ जा रहे हो? सब ठीक?" इकबाल ने फ़िरोज़ को टोका।


ठिठकते हुए फ़िरोज़ ने इकबाल को देखा और बोला, "मिठाई लेनी है और घर में कुछ मरम्मत के काम के लिये प्लम्बर को भी बोलना है। थोड़ा जल्दी में हूँ। दीवाली के बाद मिलते हैं।"

    "एक फुलझड़ी का डिब्बा और आधा किलो काजू बर्फी मेरे लिये भी ले आना। मैं किसी के हाथ रुपये भिजवा कर तुम्हारे घर से मँगवा लूँगा", इकबाल बोला।

    ठीक है, बोलकर फ़िरोज़ ने अपने कदम फिर से तेज़ किये।

रमेश ने शर्मा जी से पूछा, "पिता जी! ये चचा तो मुसलमान हैं, फिर दीवाली की तैयारी में क्यों लगे हैं"?

 शर्मा जी बेटे के प्रश्न पर मुस्कुराए। "बेटा दीवाली पर शहर के स्कूलों में छुट्टियाँ होती हैं। जब पोते पोतियाँ घर आएं तभी त्योहार मनता है। पोतों के आने पर ईद या दीवाली में कोई फर्क नहीं रहता।"


स्वरचित एवं मौलिक

~नकुल गौतम

मैं वापिस आऊंगी

 मेरा नाम इतना भी कॉमन नहीं है कि किसी और की जगह मुझे ईमेल आ जाए। फिर दफ्तर में हमारा इंटरेक्शन भी अब उतना नहीं था। उस दिन अचानक जब उसका ईमे...