Tuesday, 18 August 2020

खुदकुशी

पहाड़ी इलाकों की खासियत है कि दूर दूर तक साफ देखा जा सकता है। बहुत सी पहाड़ियाँ आसपास हों तो एक पहाड़ी की चोटी से दूसरी पहाड़ी पर आराम से दिखायी देता है। किशोरवस्था में नज़र भी तो कमाल हुआ करती थी।

इस पहाड़ी पर किशोरावस्था में रमेश घंटों इंतजार किया करता था। सामने की पहाड़ी की चोटी पर सपना का घर था जिसे वह घर से निकल कर स्कूल जाते हुए रोज़ देखा करता था। इस पहाड़ी पर रमेश को सपना नहीं देख सकती थी, लेकिन रमेश रोज़ उसे देखता था।

जीवन के इस पड़ाव पर कोई महत्वाकांक्षा, कोई आकर्षण, कोई सम्भावना बाकी नहीं रही थी। सब कुछ तयशुदा सा हो रहा थी। कोई उत्साह, कोई उमंग नहीं थी। पाने की इच्छा भी नहीं रही थी और ना उम्मीद ही थी। यही सोचते हुए रमेश धीरे धीरे पहाड़ी पर चढ़ रहा था। रमेश इसी पहाड़ी से कूद कर जान देने जा रहा था।

पहाड़ी की चोटी पर पहुँच कर उसने एक नज़र सपना के घर की ओर डाली और महसूस किया कि सब कुछ बदल सा गया था। जहाँ सिर्फ एक घर हुआ करता था, वहाँ पूरा मोहल्ला था। नज़र भी अब चुस्त नहीं रही। चाह कर भी वह सपना का घर ठीक से नहीं देख पा रहा था।

पहाड़ी से छलाँग लगाने से पहले उसने इस पहाड़ी को पलट कर देखा। दूर एक कोने में एक लड़का गहरी नीली स्वेटर पहने दिखायी दिया। रमेश दबे पाँव उस ओर गया। उस लड़के का ध्यान रमेश पर ज़रा भी नहीं गया। कितनी बेपरवाह होती है यह उम्र। लड़के से कुछ दूरी पर पहुँच कर उसने महसूस किया कि वह लड़का कितनी ही उम्मीद से सामने की पहाड़ी पर नज़र टिकाये बैठा था। अचानक लड़के के होंठों पर मुस्कान उभर आयी। रमेश ने देखा कि सामने वाली पहाड़ी की चोटी से एक लडक़ी बस्ता उठाये जा रही थी। अचानक रमेश की नज़र एकदम साफ़ हो गयी। उसे अब सपना का घर भी साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था।

उस लड़के की नज़र लड़की के कदमों से कदम मिला रही थी। रमेश पीछे हट गया और पहाड़ी से लौट आया। मेरी नाउम्मीदी को किसी और की संभावनाओं पर अंकुश लगाने का कोई हक़ नहीं।

रमेश अब अक्सर छुप छुप कर इस लड़के को देखने पहाड़ी पर जाता है। वह उस लड़के की संभावनाओं में अपने जीवन को खोजने लगा है।

...
नकुल गौतम

मैं वापिस आऊंगी

 मेरा नाम इतना भी कॉमन नहीं है कि किसी और की जगह मुझे ईमेल आ जाए। फिर दफ्तर में हमारा इंटरेक्शन भी अब उतना नहीं था। उस दिन अचानक जब उसका ईमे...